मक्काबियों का पहला ग्रन्थ

अध्याय 13

1सिमोन ने सुना कि त्रीफोन ने एक भारी सेना एकत्रित कर रखी है, जिससे वह यूदा का विनाश करने वहाँ जाये। 2जब सिमोन ने यह देखा कि लोग भयभीत है, तो वह येरूसालेम गया। 3और उसने लोगों को सान्त्वना दे कर उन से कहा, "आप जानते हैं कि मैंने, मेरे भाइयों और मेरे कुटुम्बियों ने संहिता और मन्दिर की रक्षा के लिए क्या-क्या किया, कितना संघर्ष किया और कितने कष्ट झेले। 4इस्राएल के नाम पर मेरे सब भाइयों ने अपने प्राण न्योछावर किये। अब अकेले मैं ही जीवित हूँ 5लेकिन इस विपत्ति के समय अपने प्राण बचाने का विचार मुझ से कोसों दूर है। मैं अपने भाइयों से बढ़ कर नहीं हूँ। 6मैं अपनी जाति, मन्दिर, आपकी पत्नियों और सन्तान का बदला चुकाऊँगा; क्योंकि सभी गैर-यहूदी जातियाँ हम से बैर रखती और हमारा विनाश करने एकत्र हो गयी हैं।" 7ये बातें सुन कर लोगों में नया जीवन आ गया। 8उन्होंने ऊँचे स्वर में कहा, "अब यूदाह और अपने भाई योनातान की जगह आप हमारे नेता बनें। 9आप हमारी ओर से युद्ध करें। आप जो कुछ कहेंगे हम वह करने को तैयार रहेंगे।" 10इसके बाद उसने सभी युद्धकुशल लोगों को एकत्रित किया, शीघ्र ही येरूसालेम की दीवारें बनवायीं और नगर को चारों ओर से सुदृढ़ किया। 11उसने अबसालोम के पुत्र योनातान को पर्याप्त सेना के साथ याफ़ा भेजा। वह वहाँ के निवासियों को भगा कर स्वयं वहाँ रह गया। 12तब त्रीफोन एक बड़ी सेना ले कर पतोलेमाइस से यूदा देश की ओर चल दिया। योनातान भी बन्दी के रूप में उसके साथ था। 13इधर सिमोन मैदान के एक छोर पर अदीदा में पड़ा था। 14जब त्रीफोन ने सुना कि सिमोन ने अपने भाई योनातान का स्थान ले लिया और वह उस से लड़ने को तैयार है, तो उसने दूत भेज कर उसे 15कहलवाया; "मैंने योनातान को बन्दी बना कर इसलिए रखा है कि अब तक उसने अपने पदों का राज-कर नहीं चुकाया। 16यदि आप एक सौ मन चाँदी और बन्धक के रूप में उसके दो पुत्रों को भेंजे, जिससे वह मुक्त होने पर हमारा शत्रु न बने, तो हम उसे छोड़ देंगे।" 17यद्यपि सिमोन को एक कपटपूर्ण सन्देश पर विश्वास नहीं था, फिर भी उसने यह बात मान ली और चाँदी तथा बच्चों को ले आने का आदेश दिया, जिससे उसके अपने लोग उस से बैर न करने लगें 18और उन्हें यह कहने का अवसर न मिले, "उसने चाँदी और बच्चों को नहीं भेजा, इसलिए योनातान का विनाश हो गया"। 19इसलिए उसने बच्चों को और एक सौ मन चाँदी भेजी, लेकिन त्रीफोन ने धोखा दिया। उसने योनातान को मुक्त नहीं किया। 20इसके बाद त्रीफोन ने देश का विनाश करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया। वह चक्कर लगा कर अदोरा की ओर बढ़ा। वह जहाँ-जहाँ जाता था, सिमोन और उसकी सारी सेना वहाँ-वहाँ उसका सामना करती। 21येरूसालेम के गढ़ के लोगों ने त्रीफोन के पास आदमी भेज कर कहलवाया कि वह उजाड़खण्ड के मार्ग से जल्दी ही आ जाये और उनके लिए खाद्य-सामग्री भेंजे। 22त्रीफोन ने वहाँ जाने के लिए सब घुडसवार तैयार कर लिये, किंतु उस रात इतनी बर्फ गिरी कि वे वहाँ नहीं जा सके। तब वह पडाव उठा कर गिलआद गया। 23जब वह बसकामा के निकट पहुँचा, तो उसने योनातान का वध कराया और वह वहीं दफनाया गया। 24इसके बाद त्रीफोन मुड कर अपने देश रवाना हुआ। 25सिमोन ने आदमी भेज कर अपने भाई योनातान की अस्थियाँ मँगवायीं और उन्हें अपने पिता के नगर मोदीन में दफना दिया। 26उसके लिए सभी इस्राएलियों ने बड़ा भारी शोक मनाया और वे उसके लिये बहुत दिन तक विलाप करते रहें। 27सिमोन ने अपने पिता और अपने भाइयों की कब्रों पर एक मकबरा बनवाया, जिसके पीछे और सामने के पत्थर चमकदार थे और वह इतना ऊँचा था कि वह बहुत दूर से दिखाई देता था। 28उसने अपने पिता, अपनी माता और अपने चार भाइयों के नाम पर एक पंक्ति में सात स्तूप बनवाये। 29उसने कलात्मक ढंग से उन स्तूपों के चारों ओर ऊँचे स्तम्भ बनवाये और मृतकों की चिरस्थायी स्मृति के लिए उन स्तम्भों पर अस्त्र-शस्त्र और पोत खुदवाये, जिससे समुद्र की यात्रा करने वाले लोग उनके दर्शन करें। 30वह मकबरा, जिसे उसने मोदीन में बनवाया था, आज भी वहाँ विद्यमान हैं। 31त्रीफोन ने राजा अंतियोख को, जो अभी वयस्क नहीं था, धोखा दे कर मरवा डाला। 32और उसके स्थान पर स्वयं राजा बन गया। इस तरह उसके एशिया का मुकुट अपने सिर पर धारण किया और देश पर भारी आपत्तियाँ ढाहीं। 33इधर सिमोन ने यहूदिया के गढ़ों का पुनर्निर्माण किया और उन्हें बुर्जों, बड़ी दीवारों और अर्गलाएँ लगे फाटकों से घिरवा दिया। उसने उन गढ़ों में खाद्य-सामग्री रखवायी। 34इसके बाद सिमोन ने आदमी चुन कर राजा देमेत्रियस से यह निवेदन करने को भेजा कि वह यहूदिया को कर में छूट दिलायें, क्योंकि त्रीफोन देश को लूटता रहा था। 35देमेत्रियस ने उसे अनुकूल उत्तर दिया और उसके नाम यह पत्र लिखा: 36"राजाओ के मित्र प्रधानयाजक सिमोन, यहूदियों के नेताओं और जनता को राजा देमेत्रियस का नमस्कार। 37आप लोगों ने जो सोने का मुकुट और खजूर की डाली हमें भेजी है, वह हमें मिल गयी है। हम आपके साथ स्थायी शांति की संधि करने और आप को छूट देने के लिए अपने पदाधिकारियों को लिखने को तैयार हैं। 38हम आप लोगों को जो छूट दे चुके हैं, वह वैसी ही रहेगी। आप लोगों ने जो गढ बनवाये हैं, उन पर आप लोगों का अधिकार रहेगा। 39यदि आपने आज तक किसी बात में ढिलाई की हो या आप से कोई भूल हो गयी हो और आपने राज-उपहार नहीं भेजा हो, तो हम उन सब की माफी देते हैं। यदि येरूसालेम में और कोई लगान वसूल किया जा रहा हो, तो वह आगे नहीं लिया जायेगा। 40यदि आपके बीच ऐसे व्यक्ति हों, जो हमारे अंगरक्षक बनने के योग्य हैं, तो वे भरती होने के लिए आयें। हमारे और आप लोगों के बीच शांति बनी रहे।" 41एक सौ सत्तरवें वर्ष यहूदियों पर से अन्य जातियों का जूआ उठा लिया गया। 42उस समय से लोगों ने लेखों में इस प्रकार लिखना शुरू कर दियाः ’यहूदियों के सर्वश्रेष्ठ प्रधानयाजक, सेनापति और शासक सिमोन के पहले वर्ष में" 43उस समय सिमोन ने गेज़ेर के विरुद्ध प्रस्थान किया और उसे अपनी सेना से घेर लिया। उसने एक युद्ध-यंत्र बनवा कर उसे नगर की दीवार से सटा कर खड़ा कर दिया, एक बुर्ज पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में किया। 44जब उस यंत्र से आदमी नगर में घुसे, तो नगर में भारी कोलाहल मचा। 45नगरवासी स्त्रियों और बच्चों को ले कर दीवार पर चढ़ गये, अपने कपडे़ फाड़ने लगे और ऊँचे स्वरों में सिमोन से निवेदन करने लगे कि वह उन पर दया करें। 46उन्होंने कहा, "आप हमारी दृष्टता के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी दया के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करे"। 47सिमोन ने उस की बात मान ली और उन पर आक्रमण नहीं किया। किंतु उसने उन्हें नगर से भगा दिया और उन घरों का शुद्धीकरण करवाया, जिन में देवमूर्तियाँ थीं। फिर उसने भजन और धन्यवाद के गीत गाते हुए नगर में प्रवेश किया। 48उसने नगर से सारी अपवित्र वस्तुएँ हटा दीं और उस में ऐसे आदमी बसाये, जो संहिता का पालन करते थे। फिर उसने उसे किलाबंद किया और वहाँ अपने लिए एक आवास बनवाया। 49येरूसालेम के गढ़ में पडे़ हुए लोगों को देहात में आने-जाने और खरीद-बिक्री करने से रोका जाता था। उन्हें इतनी तकलीफ होने लगी कि उन में कई लोग भूखों मर गये। 50इसलिए उन्होंने सिमोन से शांति का निवेदन किया और उसने उनकी बात मान ली। उसने उन्हें गढ़ से निकाल दिया और मूर्तिपूजा के दूषण से गढ़ का शुद्धीकरण किया। 51उन्होंने एक सौ इकहत्तरवें वर्ष, इस वर्ष के दूसरे महीने के तेईसवें दिन स्तुतिगान करते, हाथ में खजूर की डालियाँ लिये, सितार, मंजीरा और वीणा बजाते हुए, स्तोत्र और भजन गाते हुए उस में प्रवेश किया; क्योंकि इस्राएल से एक विकट शत्रु को नष्ट कर दिया गया था। 52सिमोन ने प्रति वर्ष उल्लास के साथ यह दिन मनाने का आदेश दिया। उसने पर्वत का वह भाग, जिस पर मन्दिर अवस्थित था और जो गढ़ से सटा हुआ था, पूरी तरह सुदृढ कर दिया और वहीं अपने लोगों के साथ रहने लगा। 53जब सिमोन ने देखा कि अब उसका पुत्र योहन बड़ा हो गया है, तो उसने उसे अपनी समस्त सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया और वह गेजे़र में रहने लगा।