1मिस्र के राजा ने एक विशाल सेना तैयार की, जो समुद्रतट के रेतकणों की तरह असंख्य थी और उसने बहुत-सी नावें भी तैयार की। उसने सोचा कि वह धोखे से सिकन्दर के राज्य पर अधिकार कर उसे अपने राज्य में मिला ले। 2वह शान्ति की बातें करते हुए सीरिया गया। नगरों के निवासियों ने उसके लिए अपने फाटक खोले और उसका स्वागत किया; क्योंकि राजा सिकन्दर ने आज्ञा दी थी कि वे उसके ससुर के लिए ऐसा करें। 3लेकिन पतोलेमेउस जिस किसी नगर में प्रवेश करता था, उस में अपना एक दल छोड़ देता। 4जब वह अज़ोत के पास आया, लोगों ने उसे दागोन को जलाया हुआ मन्दिर दिखाया। उन्होंने अज़ोत और उसके आसपास के खँडहर और लोगों की वे अस्थियाँ दिखायीं, जो लड़ाई में जलायी गयी थीं; क्योंकि उन्होंने उसके रास्ते पर ही इनके ढेर लगा दिये थे। 5लोगों ने योनातान की शिकायत करते हुए राजा को वह सब बताया, जो उसने किया था। किन्तु राजा मौन रहा। 6योनातान राजा से मिलने बड़ी धूम-धाम से याफ़ा आया। उन्होंने एक दूसरे को नमस्कार किया और वहीं एक साथ रात बितायी। 7योनातान राजा के साथ एलूथरस नदी के पास तब गया और उसके बाद येरूसालेम लौट गया। 8राजा पतोलेमेउस ने मन में सिकन्दर के विरुद्ध षड्यन्त्र रच कर सिलूकिया तक समुद्रतट के सब नगरों पर अधिकार कर लिया। 9उसने दूतों द्वारा राजा देमेत्रियस को यह कहला भेजाः “आइए, हम परस्पर सन्धि कर लें। मैं अपनी पुत्री आप को दे दूँगा, जो सिकन्दर की पत्नी है और आप अपने पिता के राज्य के राजा बन जायेंगे। 10मुझे दुःख है कि मैंने उसे अपनी पुत्री दी। उसने मेरा वध करना चाहा। 11उसने सिकन्दर पर यह अभियोग लगाया, क्योंकि वह उसका राज्य छीनना चाहता था। 12उसने उस से अपनी पुत्री वापस ले ली और उसे देमेत्रियस को दे दिया। उसने सिकन्दर से अपनी मित्रता भंग कर दी और दोनों की शत्रुता स्पष्ट हो गयी। 13पतोलेमेउस ने अन्ताकिया में प्रवेश कर एशिय़ा का राजमुकुट अपने सिर पर धारण किया। इस तरह उसने दो मुकुट धारण कर लिये - एक मिस्र का और दूसरा एशिया का। 14उन दिनों राजा सिकन्दर किलीकिया में था, क्योंकि उस प्रदेश के लोगों ने विद्रोह किया था। 15सिकन्दर को जैसे ही यह पता चला, वह उसके विरुद्ध लड़ने चला। पतोलेमेउस ने एक विशाल सेना के साथ उसका सामना किया और उसे भगा दिया। 16सिकन्दर शरण के लिए अरब भागा और पतोलेमेउस पूर्ण रूप से विजयी हुआ। 17अरबी ज़ब्दीएल ने सिकन्दर का सिर कटवा कर उसे पतोलेमेउस के पास भेज दिया। 18इसके तीसरे ही दिन राजा पतोलेमेउस की भी मृत्यु हो गयी और उसने जो दल किलाबन्द नगरों में रख छोड़े थे, वहाँ के निवासियों ने उनकी हत्या कर दी। 19देमेत्रियस एक सौ सड़सठवें वर्ष राजा बना। 20उन्हीं दिनों योनातान ने येरूसालेम पर अधिकार करने के लिए यहूदिया के लोगों को इकट्ठा किया। उसने उसके विरुद्ध बहुत सारे युद्ध-यन्त्रों का निर्माण किया। 21इस पर कुछ धर्मत्यागी यहूदी, जो अपनी जाति से बैर रखते थे, राजा के पास गये और उसे से बोले कि योनातान ने गढ़ को घेर लिया है। 22यह सुनकर राजा क्रुद्ध हुआ और शीघ्र ही चलकर पतोलेमाइस आ पहुँचा। उसने चिट्ठी भेज कर योनातान को आदेश दिया कि वह घेरा उठा कर जितनी जल्दी हो सके, उस से मिलने पतोलेमाइस आये। 23योनातान ने यह सुन कर भी घेरा बनाये रखने को कहा और इस्राएल के कुछ नेताओं और याजकों को ले कर स्वयं जोखिम का सामना करने गया। 24वह उपहार के रूप में चाँदी-सोना, वस्त्र और अन्य बहुत-सी चीज़ें ले कर राजा के पास पतोलेमाइस गया। इस प्रकार वह उसका कृपापात्र बन गया। 25तब कुछ धर्मत्यागी यहूदी उस पर अभियोग करने आये, 26किन्तु राजा ने अपने पहले के शासकों की तरह अपने सभी मित्रों के सामने योनातान का सम्मान किया। 27उसने प्रधानयाजक के पद पर उसकी नियुक्ति की पुष्टि की, जो उपाधियाँ उसे प्राप्त हो चुकी थीं, उन्हें फिर प्रदान किया और उसका नाम अपने घनिष्ट मित्रों की सूची में लिखवाया। 28योनातान ने राजा से निवेदन किया कि वह यहूदिया और समारिया के तीन जनपदों को कर-मुक्त कर दे और उस से प्रतिज्ञा की कि वह उसे तीन मन (द्रव्य) दिया करेगा। 29राजा ने यह सब स्वीकार कर लिया और योनातान को इस सम्बन्ध में यह पत्र दिया: 30भाई योनातान और यहूदियों को राजा देमेत्रियस का नमस्कार। 31हमने आप लोगों के विषय में अपने सम्बन्धी लस्थेनस को जो पत्र भेजा है, जिससे आप उसकी जानकारी प्राप्त करें: 32पिता लस्थेनस को राजा देमेत्रियस का प्रणाम। 33यहूदी हमारे साथ मित्रता रखते हैं और वे आज तक हमारे अधिकारों की रक्षा करते आ रहे हैं। इसलिए हमने निश्चय किया है कि हमारे प्रति उनका जो सद्भाव है, हम उनका मूल्य चुकायें। 34हमने उन्हें यहूदिया प्रान्त दिया हैं; साथ ही एफ्ऱईम, लिद्दा और रामतईम के तीनों जनपद और उनके निकटवर्ती भाग समारिया से अलग कर यहूदिया प्रान्त में येरूसालेम के याजकों के लिए मिला दिये जाते हैं। ये जनपद उन्हें अपनी भूमि और अपने फलों की उपज पर परम्परागत वार्षिक राज-कर के बदले में दिये जाते हैं। 35अन्य सभी दशमांश और कर, नमक का महसूल, राज-उपहार-इन सब से उन्हें मुक्त किया जाता है। 36इस में आज से कभी भी कोई परिवर्तन नहीं होगा। 37इस पत्र की एक प्रतिलिपि तैयार करा कर योनातान को दे दें, जिससे वह पवित्र पर्वत के किसी सार्वजनिक स्थान पर रखा जायें। 38जब राजा देमेत्रियस ने देखा कि उसके शासन में अब देश में शान्ति है और कोई उसका विरोध नहीं कर रहा है, तो उसने उन ग़ैर-यहूदियों के सिवा, जिन्हें उसने द्वीपों से ला कर भरती किया था, अपनी सारी सेना को सेवा से मुक्त कर, सभी को अपने-अपने घर जाने को कहा। इस से उसके पूर्वजों के सभी सैनिक उस से बैर करने लगे। 39जब त्रिफ़ोन ने, जो सिकन्दर का पक्षधर, रह चुका था, यह देखा कि सभी सैनिक देमेत्रियस के विरुद्ध भुनभुना रहे हैं, तो वह अरबी इमलकुए के पास गया, जो सिकन्दर के पुत्र कुमार अन्तियोख को दीक्षा दे रहा था। 40उस ने उसे अनुरोध किया कि वह उसे उस लड़के को दे दे, जिससे वह अपने पिता की जगह राजा बने। उसने उसे यह सब बताया कि देमेत्रियस ने क्या-क्या किया और यह भी कि सैनिक उस से कैसे बैर करते थे। वह बहुत दिनों तक रुका रहा। 41इस बीच योनातान ने राजा देमेत्रियस से निवेदन किया कि वह येरूसालेम के गढ़ और अन्य किलाबन्द नगरों से अपने सैनिक हटा लें; क्योंकि वे इस्राएल के विरुद्ध लड़ते थे। 42देमेत्रियस ने योनातान को कहला भेजाः “मैं आप और आपकी जाति के लिए न केवल यह करूँगा, बल्कि उचित अवसर आने पर आपका और आपकी जाति का सम्मान करूँगा। 43किन्तु इस समय आप ऐसे सैनिक भेजें, जो मेरी ओर से युद्ध करें, क्योंकि मेरी सारी सेना मेरे विरुद्ध हो गयी है“ 44इसलिए योनातान ने तीन हज़ार युद्धकुशल आदमियों को अन्ताकिया भेजा। जब वे राजा के पास पहुँचे, तो राजा बहुत प्रसन्न हुआ। 45लेकिन नगर के एक लाख बीस हज़ार पुरुष राजा का वध करने के लिए जमा हो गये। 46राजा ने अपने महल में शरण ली और नगरवासी गलियों पर अधिकार कर लड़ने लगे। 47राजा ने यहूदियों को सहायता के लिए बुलाया। वे सब उसके पास आये और पूरे नगर में चारों ओर फैल गये। उन्होंने उसी दिन एक लाख आदमियों का वध किया। 48उन्होंने उसी दिन पूरा नगर लूटा और उस में आग लगा दी। इस प्रकार उन्होंने राजा की रक्षा की। 49जब नगरवासियों ने देखा कि नगर पर यहूदियों का अधिकार हो गया और अब वे जैसा चाहें, वैसा कर सकते हैं, तो उनका साहस टूट गया और उन्होंने राजा से दया की याचना की। उन्होंने कहा, 50“अपना दाहिना हाथ बढ़ा कर हमारी सहायता कीजिए। यहूदी हमसे और हमारे नगर से लड़ना बन्द करें।“ 51उन्होंने अपने शस्त्र डाल कर सन्धि कर ली। राजा और उसके राज्य के सभी लोगों की ओर से यहूदियों का बड़ा सम्मान किया गया और वे लूट से लद कर येरूसालेम लौट गये। 52जब राजा देमेत्रियस राजसिंहासन पर फिर बैठ गया और देश भर में शान्ति हो गयी, 53तो उसने अपना वचन भंग कर दिया और योनातान के प्रति उसका रुख़ बदल गया। उसने उसके किये हुए उपकारों का प्रतिदान नहीं दिया और उसे बहुत तंग करने लगा। 54इन घटनोओं के बाद त्रीफ़ोन अन्तियोख के साथ लौटा, जो अभी बहुत छोटा था। उसने उसे राजा बनाया और उसके सिर पर राजमुकुट पहना दिया। 55उसके पास वे सभी सैनिक आये, जिन्हें देमेत्रियस ने निकाल दिया था और उसके विरुद्ध लड़ने लगे। देमेत्रियस पराजित हो कर भाग निकला। 56त्रीफ़ोन ने हाथियों को अपने अधिकार में किया और अन्ताकिया को जीता। 57तब कुमार अन्तियोख ने योनातान को यह लिख: “मैं आप को प्रधानयाजकीय पद पर स्थायी करता, चारों जनपदों पर नियुक्त करता और आप को राजा के मित्रों में सम्मिलित करता हूँ“। 58उसने उसे खाने-पीने के लिए सोने के बरतन और सोने के पात्र भेजे तथा उसे सोने के पात्रों में पीने, बैंगनी वस्त्र पहनने और सोने का बकसुआ लगाने की अनुमति दी। 59उसने उसके भाई सिमोन को तीरुस की निसेनी से ले कर मिस्र की सीमा तक के देश का सेनापति नियुक्त किया। 60इसके बाद योनातान ने चल कर नदी के पार के प्रदेश और उसके नगरों का भ्रमण किया। सीरिया की सारी सेना उसकी सहायता करने आयी। वह अश्कलोन आया, तो नागरिकों ने उसका सादर स्वागत किया। 61वह वहाँ से आगे गाज़ा तक गया, लेकिन गाज़ावासियों ने फाटक नहीं खोले। इसलिए उसने नगर को घेर लिया, उसके आसपास की जगहों को लूटा और उसके बाद उन में आग लगा दी। 62गाज़ावासियों ने योनातान से प्रार्थना की और उसने उन से सन्धि कर ली। उसने उनके कुलीन पुत्रों को बन्धक के रूप में ले लिया और उन्हें येरूसालेम भेजा। इसके बाद उसने दमिश्क तक उस क्षेत्र का भ्रमण किया। 63योनातान ने सुना कि देमेत्रियस के सेनापति एक बड़ी सेना के साथ गलीलिया के देश तक आ गये हैं और उसे अपदस्थ करना चाहते हैं। 64वह अपने भाई सिमोन को अपने देश में छोड़ कर उनका सामना करने चला। 65सिमोन ने बेत-सूर के पास पड़ाव डाला था। वह बहुत दिनों तक उसके साथ लड़ता रहा और उसे घेर लिया। 66अन्त में वहाँ के निवासी उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार हो गये और उसने उन से सन्धि कर ली। उसने उन्हें नगर से निकाल कर उस पर अधिकार कर लिया और उस में एक रक्षक-सेना को छोड़ रखा। 67योनातान अपनी सेना के साथ गन्नेसरेत सागर के किनारे पड़ाव डालने के बाद मुँह-अँधेरे हासोर के मैदान में पहुँचा। 68तभी गै़र-यहूदियों की सेना उन्हें मैदान में दिखाई पड़ी। उन्होंने पहाड़ियों की ओट में कुछ सैनिक घात में बिठा रखे थे। 69जब योनातान ने सेना का सामना किया, तो जो घात में बैठे थे, वे निकल पड़े और उस पर आक्रमण करने लगे। 70योनातान के सभी सैनिक भाग खड़े हुए। अबसालोम के पुत्र मत्तथ्या और ख़ल्फ़ी के पुत्र यूदा के सिवा जो सेनापति थे, उन में एक भी पीछे नहीं रहा। 71योनातान ने अपने कपड़े फाड़ दिये, सिर पर राख डाल और प्रार्थना की। 72इसके बाद वह लड़ाई में कूद पड़ा। शत्रु पीछे हटने और भागने लगे। 73जब उसके आदमियों ने, जो भाग रहे थे, यह देखा, तो वे फिर उसके पास लौट आये और शत्रुओं को केदेश के उनके पड़ाव तक खदेड़ ले गये। उन्होंने वहाँ पड़ाव डाला। 74उस दिन लगभग तीन हज़ार गै़र-यहूदी सैनिक मारे गये। इसके बाद योनातान येरूसालेम लौट आया।