1जब अंतियोख पहाड़ी प्रांतों का दौरा कर रहा था, तो उसने सुना कि फारस देश का एलिमईस नगर अपनी संपत्ति और सोना-चाँदी के लिए प्रसिद्ध है। 2और यह कि वहाँ का मंदिर अत्यंत समृद्ध है और उस में वे स्वर्ण ढाले, कवच और अस्त्र-शस्त्र सुरक्षित हैं, जिन्हें फिलिप के पुत्र सिंकदर, मकूदूनिया के राजा और यूनानियों के प्रथम शासक, ने वहाँ छोड दिया था। 3इसलिए वह उस नगर पर अधिकार करने और उसे लूटने के उद्देश्य से चल पडा, किंतु वह ऐसा नहीं कर पाया; क्योंकि नागरिकों को उस अभियान का पता चल गया था। 4उन्होंने हथियार ले कर उसका सामना किया और उसे भागना पड़ा। उसने दुःखी हो कर वहाँ से बाबुुल के लिए प्रस्थान किया। 5वह फारस में ही था, जब उसे यह समाचार मिला कि जो सेना यहूदिया पर आक्रमण करने निकली थी, वह पराजित हो कर भाग रही है। 6लीसियस एक विशाल सेना ले कर वहा गया था, किंतु उसे यहूदियों के सामने से पीछे हट जाना पडा। अब यहूदी अपने अस्त्रों, अपने सैनिकों की संख्या और पराजित सेनाओं की लूट के कारण शक्तिशाली बन गये थे। 7उन्होंने येरूसालेम की होम-वेदी पर अन्तियोख द्वारा स्थापित घृणित मूर्ति को ढाह दिया, पहले की तरह मंदिर के चारों ओर ऊँची दीवार बनवायी और उसके नगर बेत-सूर की भी किलाबंदी की। 8राजा यह सुन कर चकित रह गया वह बहुत घबराया, पलंग पर लेट गया और दुःख के कारण बीमार हो गया; क्योंकि वह जो चाहता था, वह नहीं हो पाया था। 9वह इस तरह बहुत दिनों तक पड़ा रहा, क्योंकि एक गहरा विषाद उस पर छाया रहा। तब वह समझने लगा कि वह मरने को है 10और उसने अपने सब मित्रों को बुला कर उन से कहा, "मुझे पर दुःख का कितना बड़ा पहाड टूट पड़ा है! मैं तो अपने शासन के दिनों में दयालु और लोकप्रिय था’। 11मैंने पहले अपने मन में कहा, मैं कितना कष्ट सह रहा हूँ ओर मुझ पर दुःख का कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ा है। मैं तो अपने शासन के दिनों दयालु और लोकप्रिय था। 12किंतु अब मुझे याद आ रहा है कि मैंने येरूसालेम के साथ कितना अत्याचार किया- मैं वहाँ के चाँदी और सोने के पात्र चुरा कर ले गया और मैंने अकारण यूदा के निवासियों को मारने का आदेश दिया। 13मुझे लगता है कि मैं इसी से कष्ट भोग रहा हूँ और गहरे शोक के कारण यहाँ विदेश में मर रहा हूँ" 14उसने अपने मित्र फ़िलिप को बुलाया और उसे अपने समस्त राज्य का प्रधान नियुक्त किया। 15उसने उसे अपना मुकुट, अपने राजकीय वस्त्र तथा अपनी अंगूठी दी और उसे अपने पुत्र अंतियोख को सुयोग्य राजा बनने की शिक्षा दिलाने को कहा। 16राजा अंतियोख की मृत्यु एक सौ उनचासवें वर्ष में हुई। 17इधर जब लीसियस ने सुना कि राजा की मृत्यु हो गयी है, तो उसने उसके पुत्र अंतियोख को राजगद्दी पर बैठाया। उसने बचपन से उसकी शिक्षा का प्रबंध किया था और अब उसने उसका नाम यूपातोर रखा। 18येरूसालेम के गढ़ के लोग मंदिर के आसपास के इस्राएलियों को तंग करते, हर समय उन को हानि पहुँचाते और गैर-यहूदियों की सहायता करते थे। 19इसलिए यूदाह ने उसका विनाश करने का निश्चय किया और उन्हें घेरने के लिए सब लोगों को इकट्ठा किया। 20लोग आये और उन पर घेरा डाल दिया। जब एक सौ पचासवाँ वर्ष चल रहा था। शिला-प्रक्षेपक और अन्य यंत्र तैयार किये गये; 21किंतु घिरे हुए लोगों में कुछ निकल कर भाग गये। 22इस्राएल के कुछ विधर्मी लोगों ने उनका साथ दिया और राजा के पास जा कर कहा, "हमें न्याय दिलाने और हमारे भाईयों का प्र्रतिशोध लेने में आप कब तक देर करेंगे? 23हम आपके पिता के विश्वस्त सेवक रह चुके है और उनके सभी आदेशों का पालन करते आये है। 24इसलिए हमारी जाति के लोगों ने हमें घेर लिया है और हमारे शत्रु बन गये है। हम में से जो भी उन्हें मिल जाता है, वे उसे मार डालते हैं। हमारी संपत्ति लूट ली गयी है 25और उन्होंने न केवल हम पर, बल्कि आपके अधीन के क्षेत्रों पर भी आक्रमण किया। 26वे अब येरूसालेम के गढ पर अधिकार करने के लिए उस पर घेरा डाले हुए हैं और उन्होंने मंदिर और बेतसूर को किलाबंद किया है। 27यदि आप उन्हें जल्द ही नहीं रोकेंगे, तो वे आगे न जाने क्या कर बैठेंगे। फिर वे आपके वश के नहीं रहेंगे।" 28यह सुन कर राजा क्रुद्ध हो उठा उसने अपने सभी मित्रों, सेनापतियों और रसद के अधिकारियों को बुला भेजा। 29अन्य राजाओं और समुद्र के द्वीपों से भी उसके यहाँ किराये के सौनिक आये। 30उसके सैनिक बल में एक लाख पैदल सैनिक, बीस हजार घुड़सवार और बत्तीस युद्धकुशल हाथी थे। 31वे इदुमैया होते हुए आगे बढा और उन्होंने बेत-सूर के सामने पड़ाव डाला। वे बहुत दिनों तक यंत्रों के सहारे उनके विरुद्ध युद्ध करते रहे। किंतु जो लोग घिर पडे थे, वे निकल कर टूट पडते और यंत्र जलाते। वे वीरतापूर्वक लड़ते रहे। 32यूदाह ने गढ़ से चल कर बेत-जकर्या के पास राजा के पड़ाव के सामने पड़ाव डाला। 33दूसरे दिन सुबह होते ही राजा ने सेना को बेत-जकर्या की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया। वहाँ दोनों सेनाएँ पंक्तिबद्ध खड़ी कर दी गयी और तुरहियाँ बजने लगी। 34हाथियों को दाखरस और जैतून के रस द्वारा युद्ध के लिए उत्तेजित किया गया। 35वे हाथी सेना के विभिन्न जत्थों में बाँटे गये। एक-एक हाथी के साथ पाँच सौ घुडसवारों के अतिरिक्त एक हजार सैनिक खडे़ किये गये, जो कवच और काँसे के टोप पहने थे। 36घुड़सवार हाथी के आगे-आगे चलते थे और जहाँ वह जाता था, वे उसके साथ-साथ जाते थे और सदा उसके पास रहते थे। 37सुरक्षा के लिए प्रत्येक हाथी की पीठ पर लकडी का एक मजबूत हौदा बँधा था और प्रत्येक के ऊपर तीन-तीन सशस्त्र सैनिक और एक भारतीय महावत था। 38शेष घुड़सवारों को सेना के दोनों छोरों पर खडा कर दिया गया। वे बीच-बीच में शत्रु पर छापा मारते और दलों की रक्षा करते थे। 39जब सूर्य कि किरणें सोने और काँसे की ढालों पर चमकती, तो पर्वत उन से जगमगाने लगते। ऐसा लगता कि वहाँ मशाले जल रही हों। 40राजकीय सेना का एक दल पहाडियों पर और दूसरा मैंदान में था। वे सुव्यवस्थित रूप से आगे की ओर बढते थे। 41जो कोई आती हुई भीड़ का कोलाहल और शस्त्रों की झंकार सुनता, वह घबरा जाता था। सेना बहुत बड़ी और शक्तिशाली थी। 42यूदाह अपनी सेना के साथ आक्रमण करने आगे बढ़ा और राजा की सेना के लगभग छः सौ आदमी मारे गये। 43तभी एलआजार अवरन की दृष्टि राजकीय कवच पहने सबसे से बड़े हाथी पर पड़ी। इसलिए उसने सोचा कि राजा उसी पर सवार है। 44तब वह अपनी जाति की रक्षा करने और अपना नाम अमर करने के लिए प्राण न्योछावर करने को तैयार हो गया। 45वह दल के बीच में साहसपूर्वक अपने दायें-बायें के सौनिकों पर प्रहर करते हुए उस पशु की ओर बढा। 46उसने हाथी के नीचे जा कर और उसके पेट में शस्त्र मार कर उसका वध किया। हाथी उसके ऊपर आ गिरा और इस तरह वह भी वही दब कर मर गया। 47यहूदी राजकीय सेना की शक्ति और उत्साह देख कर पीछे हट गये। 48इसके बाद राजकीय सेना उन से लडने के लिए येरूसालेम तब आ पहुँची। राजा यहूदिया और सियोन पर्वत पर आक्रमण की तैयारियाँ करने लगा। 49इसी बीच राजा ने बेत-सूर के लोगों से संधि कर ली। वे नगर के बाहर आ गये। उन दिनों देश का विश्राम-वर्ष चल रहा था, इसलिए उनके पास खाद्य सामग्री की कमी थी और वे अधिक दिन वहाँ घेरे में नहीं रह सकते थे। 50इसलिए राजा ने बेत-सूर पर अधिकार कर लिया और उसे एक दल की निगरानी में रख दिया। 51वह बहुत दिन तक मंदिर पर घेरा डाले रहा, उसके सामने मंच और यंत्र लगाये, जो आग, पत्थर और वाण फेंकते थे और गोफान-जैसे यंत्र भी लगाये। 52इधर घेरे में पडे़ हुए लोगों ने भी उनके विरुद्ध यंत्र लगाये और इस तरह लडाई बहुत दिनों तक चलती रही। 53भण्डारों में खाद्य-समाग्री समाप्त हो गयी; क्योंकि सातवाँ वर्ष चल रहा था और गैर-यहूदियों के यहाँ से आये यहूदियों ने रसद खाया था। 54अब मंदिर के पास थोड़े ही सैनिक रह गये थे, क्योंकि जब वे भूख से छटपटाने लगे, तो वे अपने-अपने घर लौट गये। 55लीसियस को पता चला कि फ़िलिप, जिसे राजा अंतियोख ने मरते समय अपने पुत्र अंतियोख को सुयोग्य राजा बनने की शिक्षा दिलाने को कहा, 56फारस और मोदिया से लौट आया है और उसके साथ वह सेना भी हैं, जो राजा के साथ गयी थी। उसने यह भी सुना कि वह राज्य पर अधिकार कर लेना चाहता है। 57इसलिए लीसियस शीघ्र ही वहाँ से चले जाने की तैयारियाँ करने लगा। उसने राजा, सेनापतियों और सैनिकों से कहा, हम प्रतिदिन कमजोर पड़ते जा रहे हैं, दिन-पर-दिन सामग्री कम होती जा रही है और यह जगह, जिसका हम घेरा कर रहे हैं, बहुत सुदृढ़ है। 58इसलिए हम इन लोगों से हाथ मिला कर इन से और इस समस्त राष्ट्र से संधि क्यों न कर लें? 59हम उन्हें यह अनुमति दे कि वे पहले की तरह, अपने रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन बितायें; क्योंकि हमने उनके रीति-रिवाजों को समाप्त करने का प्रयत्न किया और इस कारण उनका क्रोध भडक उठा और उन्होंने विद्रोह किया।" 60राजा और सेनापति यह प्रस्ताव मान गये। राजा ने उनके पास संधि का संदेश भेजा और वे लोग राजी हो गये। 61जब राजा और सेनापतियों ने उन्हें शपथपूर्वक वचन दिया, तो वे गढ़़ से बाहर आये। 62तब राजा सियोन पर्वत गया। उसने उस स्थान की किलाबंदी देख कर अपनी शपथ भंग कर दी और आदेश दिया कि चारदीवारी गिरा दी जाये। 63इसके बाद वह जल्द ही वहाँ से अंताकिया की ओर चल पडा। वहाँ उसने देखा कि फ़िलिप नगर का अध्यक्ष बन गया है। इसलिए वह, उस पर टूट पड़ा और बलपूर्वक नगर पर अधिकार कर लिया।