मक्काबियों का पहला ग्रन्थ

अध्याय 7

1जब सिलूकस का पुत्र देमेत्रियस रोम से लौटा, तो एक सौ इक्यावनवाँ वर्ष चल रहा था। वह अपने कुछ आदमियों के साथ समुद्रतट के एक नगर गया और वहाँ राज्य करने लगा। 2उसने अपने पूर्वजों के राजमहल में प्रवेश किया और उसकी सेना अंतियोख और लीसियस को गिरफ्तार कर उन्हें उसके सामने उपस्थित करना चाहती थी। 3उसने यह जान कर कहा, "मैं उनका मुँह भी देखना नहीं चाहता"। 4इस पर सैनिकों ने उन्हें मार डाला और देमेत्रियस अपने राजसिंहासन पर बैठा। 5इसके बाद अलकिमस के नेतृत्व में, जो प्रधानयाजक बनना चाहता था, उसके पास सभी निरीश्वरवादी और धर्मत्यागी इस्राएली आये। 6उन्होंने राजा के पास आ कर लोगों पर यह अभियोग लगाया, "यूदाह और उसके भाइयों ने आपके सभी मित्रों को मार डाला और अपने देश से हमें भी भगा दिया। 7आप अपने एक विश्वासपात्र व्यक्ति को भेज कर पता लगवायें कि यूदाह ने हमारे और राजा के देश के साथ कैसा अनर्थ किया है। वह व्यक्ति उन्हें तथा उनके सहायकों को दण्ड दिलाये।" 8राजा ने अपने मित्रों में बक्खीदेस को चुना, जो नदी पार के प्रदेश का राज्यपाल था तथा राज्य भर में सम्मानित और राजा का विश्वासपात्र था। 9राजा ने उसे तथा विधर्मी अलकिमस को यह वचन दे कर वहाँ भेजा कि अलकिमस वहाँ का प्रधानयाजक बन जायेगा और उसे यह आदेश दिया कि वह इस्राएलियों से बदला चुकाये। 10वे बड़ी भारी सेना ले कर चल पड़े और यूदा पहुँचे। उन्होंने यूदाह और उसके भाइयों के पास दूतों द्वारा शांति का कपटपूर्ण संदेश भिजवाया था, 11लेकिन यह देख कर उन्होंने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया कि वे विशाल सेना के साथ आये थे। 12उस समय अलकिमस और बक्खीदेस के पास शास्त्रियों का एक दल इस उद्देश्य से एकत्र हो गया कि उपस्थित समस्या का न्यायपूर्वक समाधान किया जाये। 13इस्राएलियों में हसीदी-समुदाय पहला था, जो शांतिपूर्वक समस्या का समाधान चाहता था। 14उन लोगों का कहना था कि वह याजक, जो सेना से साथ आया है, हारून का वंशज है; इसलिए वह हमारे साथ निश्चय ही अन्याय पूर्ण व्यवहार नहीं करेगा। 15अलकिमस ने उन्हें शांति का संदेश दिया और शपथ खा कर यह वचन दिया, "हम आप को या आपके मित्रों को कोई हानि नहीं पहुँचायेंगे"। 16उन्होंने उस पर विश्वास किया और तब उसने उन में साठ व्यक्तियों को गिरफ्तार किया और उन्हें एक ही दिन मार डाला-जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है- 17"उन्होंने येरूसालेम के चारों ओर तेरे संतों के शव फेंक दिये और उनका रक्त बहाया। उन को दफनाने के लिए कोई नहीं रहा।" 18इस पर सब लोगों पर भय और आतंक छा गया और उन्होंने कहा, "उनके पास न तो सत्य है और न न्याय। वे अपने वचन और अपनी शपथ से मुकर गये।" 19बक्खीदेस येरूसालेम से आगे बढ़ा और उसने बेत-जैथ के पास पड़ाव डाला। वहाँ से उसने आदमी भेज कर उन लोगों में से जो उनके दल में सम्मिलित हो गये थे, और जनता में से भी कई लोगों को गिरफ्तार किया, उनका वध किया और बड़े कुएँ में डलवा दिया। 20इसके बाद बक्खीदेस देश को अलकिमस के अधीन छोड कर और उसकी सुरक्षा के लिए उसे एक सेना दे कर राजा के पास लौट आया। 21अलकिमस ने प्रधानयाजकीय पद पाने के लिए बड़ा यत्न किया। 22वे सब लोग, जो जनता में अशांति फैलाते थे, उसके पीछे हो लिये। उन्होंने यूदा अपने अधिकार में कर लिया और इस्राएल को बड़ी हानि पहुँचायी। 23यूदाह ने देखा कि अलमिकस और उसके सहचर गैर-यहूदियों से भी अधिक इस्राएलियों के साथ बुरा व्यवहार करते थे, 24इसलिए उसने यूदा के सब प्रदेशों का दौरा करते हुए धर्मत्यागी यहूदियों से बदला चुकाया और उन्हें देश के बाहर निकलने से रोक दिया। 25जब अलकिमस ने देखा कि यूदाह और उसके आदमी शक्तिशाली होते जा रहे हैं और यह समझ लिया कि वह भविष्य में उनका सामना नहीं कर पायेगा तो वह राजा के पास लौट गया और उन पर भारी अपराधों का अभियोग लगाया। 26इसलिए राजा ने प्रसिद्ध सेनापति निकानोर को, जो यहूदियों का घोर शत्रु था, वहाँ भेजा और उसे यहूदियों का सर्वनाश करने का आदेश दिया। 27निकानोर एक बड़ी सेना ले कर येरूसालेम आया। उसने धोखा देने के लिए यूदाह और उसके भाइयों को शांति का यह कपटपूर्ण संदेश भेजा, 28"मेरे और आपके बीच लडाई नहीं होनी चाहिए। इसलिए मैं अपने कुछ लोगों के साथ आप लोगों से शांतिपूर्वक मिलने आऊँगा।" 30यूदाह यह देख कर कि निकानोर उसके साथ विश्वासघात करने के विचार से उनके पास आया है, पीछे हट गया और उसने उस से फिर भेंट करने से इनकार किया। 31इधर जब निकानोर को पता चला कि यूदाह उसका उद्देश्य समझ गया हैं, तो वह उस से लड़ने निकल पड़ा खफ़रसलामा के निकट वे एक दूसरे के विरुद्ध आ डटे। 32निकानोर के आदमियों में लगभग पाँच सौ मारे गये; शेष लोग दाऊदनगर भाग खडे हुए। 33इसके बाद निकानोर सियोन पर्वत गया। कुछ याजक और लोगों के कई नेता सद्भाव से उसे नमस्कार करने मंदिर के पवित्र क्षेत्र से बाहर आये। वे उसे राजा के कल्याण के लिए चढ़ायी जाने वाली बलि दिखाना चाहते थे। 34लेकिन उसने उसकी हँसी उड़ायी, उनका अपमान किया और घमण्ड भरी बातें की। 35फिर उसने गुस्से में यह शपथ लीः “इस बार यदि यूदाह और उसकी सेना तुरंत मेरे हाथ में नहीं दी जाती, तो मैं सकुशल लौटने पर यह मंदिर जला कर रहूँगा"। ऐसा कह वह क्रुद्ध हो कर वहाँ से चल पड़ा। 36इसके बाद याजक अंदर गये और बलि-वेदी और मंदिर के सामने खडे़ हो कर सजल नेत्रों से कहने लगे, 37"ईश्वर! तूने यह मंदिर इसलिए चुना था कि तेरा नाम यहाँ प्रतिष्ठित हो और यह तेरी प्रजा के लिए प्रार्थना और विनय का घर हो। 38अब तू ही इस व्यक्ति और इसकी सेना से बदला ले। वे तलवार के घाट उतारे जायें। याद रख कि इन लोगों ने तेरी निंदा किस तरह की है। अब इन्हें यहाँ न रहने दे" 39निकानोर येरूसालेम से चल पड़ा और उसने बेत-होरोन के निकट पडाव डाला। यहाँ सीरिया से एक और सैनिक दल उस से आ मिला। 40इधर यूदाह तीन हजार आदमियों के साथ अदास के पास पड़ाव डाले पडा था। यूदाह ने इस प्रकार प्रार्थना की: 41"एक बार जब राजकीय दूतों ने तेरी निंदा की थी, तो तेरा एक देवदूत आया था और उनके एक लाख पचासी हजार लोगों को मार गिराया था। 42तू आज भी उसी प्रकार हमारे सामने इसकी सेना का विनाश कर, जिससे अन्य लोग यह जान जायें कि उसने तेरे पवित्र स्थान की निंदा की है। तू उसके कुकर्म के अनुसार उसका न्याय कर।" 43इसके बाद दोनों सेनाओं में युद्ध छिड़ गया। अदार मास की तेरहवीं तिथि थी। निकानोर की सेना की करारी हार हो गयी और वह लडाई के आरंभ में ही मारा गया। 44जैसे ही निकानोर के सैनिकों ने देखा कि वह गिर गया है, वे अपने शस्त्र फेंक कर भाग खड़े हुए। 45यहूदी अदामा से गेजेर तक दिन भर तुरहिया बजाते हुए उनके पीछा करते रहे। 46तुरहियाँ सुन कर लोगों ने यहूदिया के आसपास के गाँवों से आ कर सैनिकों को घेरा और उन्हें तलवार के घाट उतारा। उन में एक भी जीवित नहीं रहा। 47उनका माल लूटा गया, निकानोर का सिर और उसका दाहिना हाथ, जिसे उसने गर्व से ऊपर उठाया था, काट दिया गया और उन्हें ले जा कर येरूसालेम के पास लटका दिया गया। 48लोगों को अपार आनंद हुआ और उन्होंने वह दिन महापर्व के रूप में मनाया। 49यह निश्चित हुआ कि उस दिन, अर्थात् अदार मास की तेरहवीं तिथि के प्रति वर्ष उत्सव मनाया जाये। 50इसके बाद कुछ दिन यूदा में शांति रही।