1इसी बीच देमेत्रियस ने सुना कि निकानोर और उनकी सेना युद्ध में हार गयी है। तब उसने बक्खीदेस और अलकिमस को फिर यूदा में भेजने का निश्चय किया और उसने उन्हें सेना का पाश्र्व-भाग दिया। 2वे गलीलिया हो कर चल पड़े और अरबेला के मैसालोथ पहुँचे। उन्होंने उसे अधिकार में कर लिया और बहुत लोगों का वध किया। 3वे एक सौं बावनवें वर्ष के पहले महीने येरूसालेम के सामने आ पहुँचे। 4वहाँ से वे बीस हजार पैदल सैनिक और दो हजार घुड़सवार ले कर बरेआ की ओर आगे बढे। 5इधर तीन हज़ार चुने हुए योद्धाओं को ले कर यूदाह एलासा के पास पड़ाव डाले पड़ा था। 6जब उसके आदमियों ने एक विशाल सेना को आते देखा-सचमुच वह सेना बहुत बड़ी थी-तो वे बहुत अधिक डर गये। बहुत-से लोग पड़ाव से भाग गये। उन में केवल आठ सौ रह गये। 7जब यूदाह ने देखा कि उसकी सेना भाग रही है और लडाई एकदम सिर पर आ गयी है, तो उसका साहस टूट गया; क्योंकि अब लोगों को एकत्रित करने का समय भी नहीं था। 8उसने निराशा में उन शेष लोगों से कहा, "चलों हम अपने विरोधियों से लडने चलें। संभव है, हम उनका सामना कर सकें।" 9लेकिन वे उस से असहमति प्रकट करते हुए कहने लगे, "नहीं, हम असमर्थ हैं। इस बार हम अपने प्राणों की रक्षा की ही सोच सकते हैं। हम अपने भाइयों को ले कर शत्रुओं से लडने फिर लौटेंगे। हमारी संख्या बहुत थोड़ी रह गयी है।" 10यूदाह ने कहा ’ऐसा नहीं होगा! हम उन्हें पीठ क्यों दिखायें? मरना ही है, तो हम अपने भाइयों के लिए लडते हुए मरे। हम अपने सम्मान पर आँच क्यों आने दें?" 11उस समय शत्रुओं की सेना उनका मुकाबला करने के लिए पडाव से बाहर आ रही थी। उनके घुडसवार दो दलों में विभक्त थे, गोफन चलाने वाले और तीर चलाने वाले लोग सेना में आगे-आगे चल रहे थे। सर्वोत्तम सैनिक सब से आगे थ। बक्खीदेस दाहिन ओर था। 12सैनिक दल तुरहियाँ बजाते हुए दोनों ओर से आगे बढ रहे थे। इधर यूदाह के लोगों ने भी तुरहियाँ बजायीं। सेनाओं के कोलाहल से पृथ्वी हिल उठी। 13लड़ाई सबेरे से शाम तक चलती रही। 14जब यूदाह ने देखा कि बक्सीदेस और उसकी सेना का प्रधान अंग दाहिनी ओर है, तो उसने अपने सब साहसी लोगों को अपने पास बुलाया। 15और उन्होंने उस दाहिये अंग को पीस डाला। वे उन्हें अजोत की पहाड़ियों तक खदेड ले गये। 16जब बायीं ओर से सैनिकों ने देखा कि दाहिना अंग पिस रहा है, तो वे मूड़ कर यूदाह और उसके आदमियों का पीछा करने गये। 17घमासान युद्ध हुआ और दोनों ओर से बहुत-से लोग मारे गये। 18यूदाह भी खेत रहा। शेष लोग भाग खड़े हुए। 19तब योनातान और सिमोन अपने भाई यूदाह को उठा कर ले गये और उन्होंने उसे मोदीन के अपने पूर्वजों के क़ब्रिस्तान में दफनाया। 20उन्होंने उसके लिए शोक मनाया और इस्राएल भर के लोगों ने उसके लिए विलाप किया। वे उसके लिए कई दिनों तक शोक मनाते और कहते रहे, 21"यह वीर योद्धा कैसे मारा गया? यही तो इस्राएल का उद्धारक था!" 22यूदाह का शेष इतिहास, उसकी लड़ाइयाँ और उसके द्वारा किये गये वीरता के कार्य तथा उसकी महत्ता-वह सब लिखित नहीं है, क्योंकि वह अपार है। 23यूदाह की मृत्यु के बाद विधर्मी इस्राएल भर में फिर दिखाई पड़ने लगे। 24उन दिनों घोर अकाल पड़ा और लोगों ने उनका साथ दिया। 25बक्खीदेस ने विधर्मियों को चुन-चुन कर उन्हें देश का अधिकारी बनाया। 26वे यूदाह के समथकों को ढूँढ-ढूँढ कर बक्सीदेस के पास ले जाते और बक्सीदेख उन्हें दण्ड देता और उनकी हँसी उड़ाता था। 27इस तरह इस्राएल की स्थिति ऐसी दुःखद हो गयी, जैसी वह तब से कभी नहीं हुई थी, जब से उनके यहाँ कोई नबी नहीं था। 28इसलिए यूदाह के सभी मित्रों ने आ कर योनातान से कहा, 29"जब से आपके भाई यूदाह की मृत्यु हुई, उनके समान ऐसा कोई नहीं रहा, जो शत्रुओं के विरुद्ध, बक्खीदेस और हमारी जाति के विरोधियों से युद्ध कर सके। 30इसलिए आज हम आपका चुनाव करते है, जिससे आप यूदाह के स्थान पर हमारे नेता बनें और हमारी ओर से युद्ध करें।" 31योनातान ने उसी समय नेता बनना स्वीकार कर लिया और अपने भाई यूदाह का पद ग्रहण किया। 32जैसे ही बक्खीदेस को इस बात का पता चला, वह उसकी हत्या करने की सोचने लगा, 33जब योनातान, उसके भाई सिमोन और उनके सभी साथियों को यह बात मालूम हुई, तो वे तकोआ के उजाडखण्ड की ओर भाग गये और उन्होंने अस्फारकुण्ड के पास पड़ाव डाला। 34बक्खीदेस को विश्राम के दिन इसका पता चल गया और वह अपनी सारी सेना ले कर यर्दन पार कर गया। 35इधर योनातान ने अपने एक भाई को युद्ध की सामग्री के साथ अपने मित्र नबातैयी लोगों के पास भेजा और उन से निवेदन किया कि वे वह विपुल सामग्री अपने पास सुरक्षित रखें। 36किंतु मेदेबा से यमब्री लोगों ने छापा मार कर योहन को गिरफ्तार किया और उसका सारा सामान ले लिया। इसके बाद वे अपनी लूट के साथ लौटे। 37योनातान और उसके भाई सिमोन को कुछ ही दिनों बाद मालूम हुआ कि यमब्री लोगों के यहाँ भारी धूमधाम से विवाह हो रहा है और प्रतिष्ठित सामन्त की कन्या नदाबाय से विशाल बारात के साथ लायी जा रही है। 38उन्हें अपने भाई योहन की हत्या की याद आयी और उन्होंने जा कर अपने को पहाड़ियों में पीछे छिपा लिया। 39जब उन्होंने आँखे उठायी तो यह देखा कि भारी धूमधाम से बड़ी भीड चली आ रही है। वर, उसके मित्र और उसके भाई बाजों, संगीतकारों और बहुत-से अस्त्र-शस्त्रों के साथ उनकी ओर आ रहे हैं। 40तब वे ओट से उन पर टूट पड़े और उन को मार गिराया। बहुत लोग मारे गये और शेष पहाडियों पर भाग खड़े हुए। उन्होंने उनका सारा सामान लूट लिया। 41विवाह शोक में और उनका वाद्य-संगीत विलाप में बदल गया। 42इस तरह उन्होंने अपने भाई की हत्या का बदला लिया और वे फिर यर्दन के निकट की दलदल भूमि में लौट आये। 43बक्खीदेस को इसका पता लगा। वह एक विशाल दलबल के साथ यर्दन तट पर आया। वह दिन विश्राम-दिवस था 44योनातान ने अपने आदिमयों से कहा, "चलो, हम जा कर अपने प्राण-रक्षा के लिए लडें। आज हमारी स्थिति वही नहीं रही, जो कल तक थी। 45हम पर सामने से या पीछे से आक्रमण हो सकता है। हमारे एक ओर यर्दन फैली है, दूसरी ओर दलदल है, झाडिया है। भाग निकलने का कोई उपाय नहीं। 46अब स्वर्ग के ईश्वर की दुहाई करो, जिससे तुम शत्रुओं के हाथ से बच निकलो।" 47युद्ध आरंभ हुआ। योनातान ने बक्खीदेस को मार गिराने के लिए हाथ उठाया, लेकिन वह पीछे हट गया। 48तब योनातान और उसके आदमी यर्दन के जल में कूद पडे जिससे वे तैर कर उस पार हो जायें। शत्रुओं ने उनका पीछा नहीं किया, वे यर्दन पार नहीं गये। 49उस दिन बक्सीदेस के लगभग एक हजार आदमी मारे गये। 50तब वह येरूसालेम की ओर चल पडा और उसने यहूदिया के अनेक किलाबंद नगरों का निर्माण किया। उसने येरोखों, अम्माऊस, बेत-होरोन, बेतेल, थमनाथा, फारथोन और तेफोन के गढ बनवाये और उन्हें ऊँची दीवारों, फाटकों और अर्गलाओं से सुदृढ़ किया। 51उन सब में उसने एक सेना-दल रखा, जिससे वह इस्राएल पर छापा मारता रहे। 52उसने बेत-सूर और गेजेर नगरों और (येरूसालेम के) गढ को भी सुदृढ़ किया तथा उन में सैनिक और खाद्य-सामग्री रखी। 53उसने देश के कुलीन पुत्रों को पकड कर और येरूसालेम के गढ में बंद कर बंधक के रूप में रखा। 54अलकिमस ने एक सौ तिरपनवें वर्ष के दूसरे महीने में मंदिर की भीतरी आंगन की दीवार गिराने की आज्ञा दी। उसने नबियों द्वारा निर्मित भवन का विनाश करना चाहा। जैसे ही विध्वंस शुरू हुआ, 55अलकिमस को दौरा पड़ा और काम रुक गया। अलकिमस का मुँह बंद हो गया उसे ऐसा लकवा मार गया कि वह न एक शब्द बोल सकता था और न अपनी गृहस्थी के विषय में कोई आदेश दे सकता था। 56अलकिमस का कष्ट बढ़ता गया और उन्हीं दिनों उसकी मृत्यु हो गयी। 57जब बक्खीदेस ने देखा कि अलकिमस की मृत्यु हो गयी हैं, तो वह राजा के पास लौट गया। इसके बाद यूदा में दो साल तक शांति रही। 58इसके बाद विधर्मियों ने मिल कर यह कहते हुए परामर्श किया, "देखो, योनातान और उसके आदमी शांति का जीवन बिताते हैं और अपने को सुरक्षित समझते हैं अब हम बक्सीदेस को बुलायें। वह रात भर में ही सब को पकड लेगा"। 59इसलिए वे उसके पास गये और उसे ऐसा करने का परामर्श दिया। 60बक्खीदेस ने एक बड़ी सेना ले कर चलने का निश्चय किया। उसने यहूदिया में अपने मित्रों के पास छिपे तौर पर चिट्ठियाँ भी लिख भेजी, जिससे वे योनातान और उसके दल को पकड लें। किंतु वे ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि उन लोगों को इस बात का पता चल गया था। 61बल्कि इसके विपरीत योनातान के लोगों ने ही यह षड्यंत्र रचने वालों के लगभग पचास आदमियों को पकड कर मार डाला। 62इसके बाद योनातान और सीमोन अपने सारे लोग के साथ बेत-बासी गये, जो उजाडखण्ड में अवस्थित नगर है। उसने वहाँ खडहरों को फिर से बसाया और उन्होंने उस नगर को सुदृढ़ किया। 63जब बक्खीदेस को इस बात का पता चला, तो उसने अपनी सारी सेना एकत्रित की और यहूदिया से भी आदमी बुलाये। 64उसने आ कर बेत-बासी को घेर लिया और बहुत दिनों तक उसके लिए युद्ध करता रहा और उसने युद्ध-यंत्र बनवाये। 65योनातान ने अपने भाई सिमोन को नगर में ही छोड़ दिया और कुछ आदमियों को लेकर खुले मैदान में निकल पड़ा। 66उसने अदोमेर और उसके भाई-बंधुओं को हराया और फरीसी लोगों के शिविर में घुस कर उन्हें पराजित किया। इन विजयों के फलस्वरूप उसकी सेना की वृद्धि होती गयी। 67उधर सिमोन और उसके आदमी नगर के बाहर टूट पड़े और युद्ध यंत्र जला डाले। वे बक्खीदेस के विरुद्ध लड़ते रहें, 68जो बुरी तरह हार गया और अपनी योजना की असफलता देख कर बहुत उदास हुआ। 69इसलिए उसका क्रोध उन विधर्मियों पर भड़क उठा, जिन्होंने उसे यहाँ बुलाया था। उसने उन में से बहुतों को मार डाला और अपने लौट जाने का निश्चय किया। 70जब योनातान को इसका पता चला, तो उसने उसके पास दूत भेजे, जिससे वे उसके साथ संधि कर लें और युद्धबंदियों को लौटाने का प्रबंध करें 71बक्खीदेस ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर उसके अनुसार कार्य किया और यह शपथ खायी कि वह आजीवन उसकी हानि नहीं करेगा। 72वह युद्धबंदी लौटा कर अपने देश लौट गया उसने यह निश्चित किया कि वह उनके देश में फिर कभी नहीं आयेगा। 73इस प्रकार इस्राएल में तलवार को विश्राम मिला। योनातान मिकास में रहने लगा और वहाँ रह कर लोगों का न्याय करता था। उसने इस्राएल के समस्त विधर्मियों का वध किया।