1इस्राएल के ईश्वर की दुहाई देने और यह प्रार्थना पूरी करने बाद 2उसने भूमि पर से उठ कर अपनी सेविका को बुलाया और ऊपरी कमरे से उतर कर अपने घर में प्रवेश किया, जिस में वह विश्राम-दिवसों और पर्वों में रहा करती थी। 3वहाँ उसने टाट और वैधव्य के वस्त्र उतारे। उसने स्नान किया, उत्तमोत्तम तेल लगाया, अपने सिर के केश सँवारे, फ़ीता बाँधा और पर्व के वे वस्त्र पहने, जिन्हें वह उस समय पहनती थी, तब उसका पति मनस्से जीवित था 4उसने अपने पाँवों में चप्पलें डालीं और नूपुर, बाजूबन्द, अँगूठियाँ, कर्णफूल आदि आभूषण पहने। उसने अपने को इस प्रकार आकर्षक बनाया कि उसे देख कर कोई भी पुरुष मुग्ध हो जा सकता था। 5इसके बाद उसने अपनी सेविका को एक कुप्पा अंगूरी और एक कुप्पी तेल दिया; फिर थैली में भूना हुआ जौ, अंजीर की रोटी, मैदे की रोटियाँ और पनीर रख दिया और रसोई के अपने सब पात्र बाँध कर अपनी सेविका को सौंपे। 6इसके बाद वे दोनों बेतूलिया नगर के फाटक गयीं। वहाँ उन्होंने उज़्ज़ीया, काब्रीस और करमीस, नगर के शासकों को खड़ा देखा। 7उसके चेहरे और वस्त्रों में इस प्रकार का परिवर्तन देख कर वे चकित हो उठे और उस से बोले, 8"इस्राएल की महिमा और येरूसालेम के गौरव के लिए हमारे पूर्वजों का ईश्वर तुम पर दया करे और तुम्हारी योजना सफल होने दे"। 9इस पर यूदीत ने मुँह के बल गिर कर ईश्वर की आराधना की और उन से कहा, "मेरे लिए नगर का फाटक खोलने की आज्ञा दीजिए, जिससे मैं जा कर वह कार्य पूरा करूँ, जिसके विषय में आपने मेरे साथ बातचीत की"। तब उन्होंने युवकों को आज्ञा दी कि वे उसके निवेदन के अनुसार उसके लिए फाटक खोल दें और उन्होंने ऐसा ही किया। 10यूदीत अपनी सेविका के साथ बाहर निकली। जब तक वह पर्वत के नीचे न उतरी और मैदान पार कर उनकी दृष्टि से ओझल न हो गयी, तब तक नगर के लोग उस को देखते रहे। 11दोनों मैदान में चली जा रही थीं कि उन्हें अस्सूरियों की एक चैकी मिली। 12वहाँ उसे रोक दिया गया और उस से यह पूछा गया, "तुम किस पक्ष की हो, कहाँ से आ रही हो और कहाँ जा रही हो?" उसने उत्तर दिया, "मैं इब्रानी स्त्री हूँ और उनके पास से इसलिए भागी जा रही हूँ कि वे तुम्हारा शिकार हो गये हैं। 13मैं तुम्हारी सेना के प्रधान सेनापति होलोफ़ेरनिस से भेंट करना चाहती हूँ, जिससे मैं उन्हें एक सच्चा समाचार दूँ और एक ऐसा मार्ग बता दूँ, जिस से हो कर जाने पर वह समस्त पहाड़ी प्रदेश पर अधिकार कर सकते हैं और उनके किसी सैनिक की क्षति या मृत्यु नहीं होगी।" 14जब उन लोगों ने उसके शब्द सुने और यह देखा कि वह अत्यन्त सुन्दर है, तो उन्होंने उस से कहा, 15"तुमने हमारे स्वामी से मिलने के लिए पहाड़ से उतर कर अपने प्राणों की रक्षा की। अब उनके तम्बू में चली जाओ। हम में से कुछ व्यक्ति तुम्हारे साथ तुम्हें उनके यहाँ पहुँचाने जा रहे हैं। 16तुम उनके सामने खड़ी होने से मत डरो। तुमने अभी जो कहा, उसे उनके सामने दुहराओ और वह तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करेंगे।" 17उन्होंने अपने बीच में एक सौ आदमी चुन कर उन्हें उसके और उसकी सेविका के साथ कर दिया और उन्होंने उन को होलोफे़रनिस के खेमे के पास पहुँचाया। 18उसके आने की ख़बर पूरे पड़ाव में फैल चुकी थी और सभी लोग एकत्र हो गये वे आकर उसके चारों ओर खड़े हो गये; क्योंकि वह तब तक होलोफ़ेरनिस के तम्बू के बाहर प्रतीक्षा करती रही, जब तक होलोफ़ेरनिस को उसके आने की सूचना न मिली। 19लोग उसकी सुन्दरता पर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे और उसके सौंदर्य के कारण इस्राएलियों की प्रशंसा करते हुए एक दूसरे से कहते थे, "कौन इस जाति को तुच्छ समझ सकता है, जिसके यहाँ ऐसी स्त्रियाँ विद्यमान है? उनके पुरुषों में किसी को जीवित रहने देना उचित नहीं है ; 20होलोफ़ेरनिस के अंगरक्षक और उसके सब सहायक अधिकारी बाहर आये और उसे तम्बू के भीतर ले गये। 21होलोफ़ेरनिस अपने पलंग पर एक बैंगनी मसहरी के अन्दर लेटा हुआ था, जो सोना-चाँदी, मरकत और अन्य मणियों से अलंकृत था। 22जब उसे यूदीत के आने की सूचना दी गयी, तो चाँदी के दीप धारण किये अनेक सेवकों के पीछे-पीछे वह ड्योंढ़ी में आया और यूदीत उसके सामने प्रस्तुत की गयी। 23जब यूदीत उसके और उसके सेवकों के सामने आयी, तो वे सभी मन-ही-मन उसके सौदंर्य की प्रशंसा करने लगे। यूदीत ने उसके सामने मुँह के बल गिर कर उसे दण्डवत् किया और होलोफ़ेरनिस के सेवकों ने उसे खड़ा किया।