यूदीत

अध्याय 8

1उस समय यूदीत नगर में रहती थी। वह मरारी की पुत्री थी; मरारी ओक्ष का पुत्र था, ओक्ष यूसुफ़ का, यूसुफ़ ओज़ीएल का, ओज़ीएल हिलकीया का, हिलकीया हनन्या का, हनन्या गिदओन का, गिदओन रफ़ाईन का, रफ़ाईन अहीटूब का, अहीटूब एलीया का, एलीया हिलकीया का, हिलकीया एलीआब का, एलीआब नतनएल का, नतनएल सलामीएल का, सलामीएल सरासदय का और सरासदय सिमओन का और सिमओन इस्राएल का पुत्र था। 2यूदीत का पति मनस्से उसके वंश और कुल का था। जौ की फ़सल के समय उसका देहान्त हो गया था। 3वह खेत में पूले बाँधने वालों का काम देख रहा था कि उसे लू लग गयी। उसे पलंग पकड़ना पड़ा और वह अपने नगर बेतूलियों में मर गया। लोगों ने उसे दोतान तथा बलामोन के बीच वाले खेत में अपने पूर्वजों के साथ दफ़ना दिया था 4विधवा बनने के बाद यूदीत ने सवा तीन वर्ष अपने घर में बिताये। 5उसने अपने घर की छत पर आने के लिए एक छोटा-सा कमरा बनवाया। वह टाट ओढ़े थी और शोक के वस्त्र पहनती थी। 6विधवा बनने के बाद वह विश्राम-दिवस के पूर्वदिन, विश्राम-दिवस, अमावस के पूर्वदिन, अमावस और इस्राएली पर्वों तथा अन्य पर्वों को छोड़ कर प्रतिदिन उपवास करती थी। 7वह सुडौल और अत्यन्त सुन्दर थी। वह समझदार और व्यवहारकुशल थी। उसका पति मनस्से उसके लिए सोना-चाँदी, दास-दासियाँ, पशुधन और खेत छोड़ गया था और वह अपनी सम्पत्ति का प्रबन्ध करती थी। उसका पति यूसुफ़ का पुत्र था, यूसुफ़ अहीटूब का, अहीटूब मेलखी का, मेलखी एलीआब का, एलीआब नतनएल का, नतनएल शूरीशद्द्य का, शुरीशद्दय सिमओन का और सिमओन इस्राएल का पुत्र था। 8कोई भी उसकी चुग़ली नहीं खाता था; क्योंकि वह ईश्वर पर बहुत श्रद्धा रखती थी। 9जनता ने जल के अभाव के कारण निराश हो कर शासक से जो कटु शब्द कहे थे, यूदीत ने उनके विषय में, सुना और वह सब भी सुना, जो उज़्ज़ीया ने लोगों से कहा था और किस प्रकार उसने शपथ खा कर उन्हें आश्वासन दिया था कि वह पाँच दिन बाद नगर को अस्सूरियों के हाथ दे देगा। 10इस पर उसने अपनी सेविका को, जो उसकी सारी सम्पत्ति की देखरेख करती थी, भेज कर नगर के अध्यक्ष काब्रीस और करमीस को बुलवाया। 11वे उसके पास आये। तब उसने उन से कहा, "बेतूलियावासियों के नेताओ! मेरी बात सुनिए। आपने लोगों के सामने जो भाषण दिया, वह उचित नहीं है। आपने प्रभु को साक्षी बना कर शपथ खायी है कि यदि प्रभु, हमारे ईश्वर ने निश्चित अवधि तक हमारी सहायता नहीं की, तो आप नगर हमारे शत्रुओं के हाथ दे देंगे। 12आप कौन होते हैं, जो आपने आज ईश्वर की परीक्षा ली और जो मनुष्यों के बीच ईश्वर का स्थान लेते हैं? 13आप सर्वशक्तिमान् प्रभु की परीक्षा लेते है। आप उसके विषय में कभी कुछ नहीं समझेंगे। 14जब आप न तो मनुष्य के हृदय की थाह ले सकेंगे और न उसके मन के विचार समझ सकेंगे, तो आप कैसे ईश्वर की थाह लेंगे, जिसने यह सब किया? आप कैसे उसके विचार जानेंगे और उसका उद्देश्य समझेंगे? 15कभी नहीं! भाइयो! आप हमारे प्रभु-ईश्वर को अप्रसन्न नहीं कीजिए। यदि वह पाँच दिन के अन्दर हमें सहायता देना नहीं चाहता, तो वह जितने दिनों के अन्दर चाहता है, वह हमारी रक्षा करने में अथवा हमारे शत्रुओं द्वारा हमारा विनाश करवाने में समर्थ है। 16आप हमारे प्रभु-ईश्वर को निर्णय के लिए बाध्य करने का प्रयत्न मत कीजिए; क्योंकि ईश्वर को मनुष्य की तरह डराया या फुसलाया नहीं जा सकता। 17इसलिए हम रक्षा के लिए धैर्यपूर्वक उसकी प्रतीक्षा करें और अपनी सहायता के लिए उस से प्रार्थना करें। यदि वह उचित समझेगा, तो हमारी पुकार सुनेगा ; 18क्योंकि आजकल हमारे बीच कोई वंश, घराना, कुल या नगर ऐसा नहीं, जहाँ लोग हाथ से निर्मित देवताओं की पूजा करते हों, जैसे पहले की जाती थी 19और जिसके कारण हमारे पूर्वज तलवार और लूट के शिकार हो गये और हमारे शत्रुओं द्वारा बुरी तरह पराजित किये गये। 20हम तो उसके सिवा किसी अन्य ईश्वर को नहीं मानते। इसीलिए हमें आशा है कि वह हमारा तिरस्कार नहीं करेगा और न हम से और न हमारी जाति पर से अपनी कृपादृृष्टि हटायेगा ; 21क्योंकि यदि हम पराधीन हुए, तो सारा यहूदिया प्रदेश पराधीन किया जायेगा और हमारा पवित्र-स्थान लूटा जायेगा और हमें रक्त बहा कर उसके अपवित्रीकरण का प्रायश्चित्त करना पड़ेगा। 22जहाँ हम विदेश में दास बनेंगे, वहाँ हमारे भाई-बन्धुओं के वध, देश से हमारी जाति के निर्वासन और हमारे दायभाग के उजाड़ का दोष हमारे सिर पड़ेगा और हमारे स्वामी हम से घृणा करेंगे और हमारा उपहास करेंगे; 23क्योंकि हम अपने स्वामियों के कृपापात्र नहीं बनेंगे, बल्कि हमारा प्रभु-ईश्वर हमारा अपमान क़ायम रखेगा। 24"भाइयो; हम अपने भाइयों को समझायें कि उनका जीवन हम पर निर्भर है; पवित्र-स्थान, मन्दिर और वेदी की सुरक्षा हमारे हाथ में है। 25इसके अतिरिक्त हम अपने प्रभु-ईश्वर को धन्यवाद दें। वह हमारी परीक्षा लेता है, जैसे उसने हमारे पूर्वजों की परीक्षा ली है। 26याद रखिए कि उसने इब्राहीम और इसहाक के साथ क्या-क्या किया और याकूब पर क्या-क्या बीती, जब वह सीरियाई मेसोपोतामिया में अपने मामा लाबान की भेड़ें चराते थे ; 27क्योंकि जिस प्रकार उसने आग में उनके हृदय की परीक्षा ली उसी प्रकार वह हमें दण्ड नहीं दे रहा है, बल्कि प्रभु शिक्षा देने के उद्देश्य से उन लोगों को कोड़ों से मारता है, जो उसकी ओर अभिमुख होते हैं।" 28इस पर उज़्ज़ीया ने उस से कहा, "तुमने जो कुछ कहा, उसे तुमने सच्चे हृदय के कहा और कोई भी व्यक्ति तुम्हारे कथन का विरोध नहीं करेगा। 29सच पूछो, तो यह पहली बार नहीं है कि तुम अपने विवेक का परिचय दे रही हो। सारी जनता तुम्हारे जीवन के प्रारम्भ से तुम्हारी बुद्धिमानी और तुम्हारे हृदय के सद्भाव जानती है। 30परन्तु लोग इतने प्यासे थे कि उन्होंने हमें उन बातों के लिए और उस शपथ के लिए विवश किया, जिसे हम भंग नहीं करेंगे। 31अब तुम हमारे लिए प्रार्थना करो, क्योंकि तुम ईश्वर-भक्त महिला हो, जिससे प्रभु हमारे जलकुण्ड भरने के लिए पानी बरसाये और हम प्यास के कारण शिथिल न पड़ें।" 32यूदीत ने उन्हें उत्तर दिया, "मेरी बात सुनिए। मैं एक ऐसा काम करूँगी, जिसकी चरचा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी जाति की सन्तानों के बीच होती रहेगी। 33आप लोग आज रात फाटक के पास आइए। मैं अपनी सेविका को साथ लिए निकल जाऊँगी और उन दिनों की अवधि के भीतर, जिस में आपने नगर हमारे शत्रुओं के हाथ देने का वचन दिया है, मेरे द्वारा प्रभु इस्राएल का उद्धार करायेगा। 34लेकिन आप लोग मुझ से यह नहीं पूछेंगे कि मैं क्या करने जा रही हूँ। मैं जो करने वाली हूँ, जब तक वह बात पूरी नहीं होगी, तब तक मैं आप को उसके विषय में कुछ नहीं बताऊँगी।" 35इस पर उज़्ज़ीया और प्रशासकों ने उस से कहा, "सकुशल जाओ! प्रभु-ईश्वर हमारे शत्रुओं से बदला लेने तुम्हारे साथ रहे!" 36इसके बाद वे उसके यहाँ से निकल कर अपनी-अपनी चैकियों पर चले गये।