यूदीत

अध्याय 5

1अस्सूरी सेना के प्रधान सेनापति होलोफे़रनिस को यह सूचना मिली कि इस्राएली लोग युद्ध की तैयारियाँ कर रहे हैं, पहाड़ी घाटियों में जाने वाले रास्ते बन्द कर रहे हैं, प्रत्येक पर्वत-शिखर की क़िलेबन्दी कर रहे है और मैदानों में घात लगाये बैठे हैं। 2यह सुन कर वह आगबबूला हो उठा। उसने मोआब के सब सामन्तों, अम्मोन के सेनाध्यक्षों और तटीय प्रान्त के सब क्षत्रपों को एकत्रित कर 3उन से कहा, "कनानियो! मुझे बताओ कि वह कौन-सी जाति है, जो पहाड़ों पर रहती है और वे कौन-से नगर हैं, जिन में वह निवास करती है। उसकी सेना कितनी बड़ी है और उसका सामर्थ्य और शक्ति किस बात में है? उसकी सेना का नेता और राजा कौन है? 4और पश्चिमी देशों के निवासियों में क्यों अकेले वही मुझ से मिलने नहीं आयी?" 5इस पर सारे अम्मोनियों के नेता अहीओर ने उस से कहा, "यदि मेरे स्वामी मुझ, अपने दास से जानना चाहें, तो में इन पहाड़ों में आपके सामने रहने वाली इस जाति के विषय में आप को सच-सच बताऊँगा। आपके दास के मुँह से कुछ भी झूठ नहीं निकलेगा। 6यह जाति खल्दैयियों की एक शाखा है। 7यह पहले मेसोपोतामिया में बस गयी थी। 8यह अपने पुरखों का मार्ग छोड़ कर स्वर्ग के उस ईश्वर की आराधना करने लगी थी, जिसका ज्ञान इसे प्राप्त हुआ था। इसलिए वहाँ के लोगों ने इसे अपने देवताओं के सामने से भगा दिया था। इस पर यह मेसोपोतामिया जा कर बहुत दिनों तक वहाँ रही। 9इसके ईश्वर ने इसे आदेश दिया कि यह अपना निवासस्थान छोड़ कर कनान देश जाये। यह वहाँ बस गयी और इसने बहुत-सा सोना-चाँदी और पशुधन प्राप्त किया। 10जब समस्त कनान में अकाल पड़ा, तो यह जाति मिस्र चली गयी। वहाँ रहते समय इसे भरण-पोषण मिला और यह इस प्रकार फूलती-फलती रही कि इसकी संख्या की गिनती असम्भव हो गयी। 11मिस्र के लोगों ने इस पर अत्याचार किया, इसे गारा और ईंट बनाने का काम दे कर इसे नीचा दिखाया और दास बना लिया। 12इसने अपने ईश्वर की दुहाई दी और ईश्वर ने समस्त मिस्र पर ऐसी विपत्तियाँ ढाहीं, जिन से मिस्री अपनी रक्षा नहीं कर सके और उन्होंने इस जाति को अपने देश से भगा दिया। 13ईश्वर इसके लिए लाल समुद्र सुखा कर 14इसे सीनई और कादेश-बरनेअ के मार्ग पर ले गया। इस जाति ने उजाड़खण्ड में रहने वाले सब लोगों को भगा दिया 15और यह अमोरियों के देश में बस गयी; फिर इसने अपने बाहुबल से हेशबोन के सब निवासियों का विनाश किया। इसके बाद इसने यर्दन नदी पार कर समस्त पहाड़ी प्रान्त अपने अधिकार में कर लिया। 16यह कनानी, परिज़्ज़ी, यबूसी, सिखेमी और सब गिरगाशी जातियों को अपने सामने से भगा कर बहुत समय तक वहीं बसी रही। 17जब तक यह अपने ईश्वर के सामने पाप नहीं करती थी, तब तक यह सकुशल रही; क्योंकि इसका ईश्वर, जो अधर्म से घृणा करता है, इसके साथ था। 18परन्तु जब यह निर्दिष्ट मार्ग से भटक गयी, तो यह बहुत-से युद्धों द्वारा निर्बल होती गयी, और अन्त में बन्दी बना कर अपने देश से निर्वासित की गयी। इसके ईश्वर का मन्दिर ध्वस्त किया गया और इसके शत्रुओं ने इसके नगर अपने अधिकार में कर लिये। 19अब यह फिर अपने ईश्वर की ओर अभिमुख हुई और जहाँ यह निर्वासित की गयी थी, वहाँ से लौटी। इसने फिर येरूसालेम अपने अधिकार में कर लिया, जहाँ इसका मन्दिर है और यह पहाड़ी प्रान्त में बस गयी, जो उजाड़ था। 20"स्वामी और प्रभु! अब यदि यह जाति दोषी है और अपने ईश्वर के विरुद्ध पाप करती और हमें इसके अपराध का पता चल जाता है, तो हम ऊपर चढ़ कर इसे पराजित कर दें। 21किन्तु यदि इस जाति में कोई अधर्म नहीं, तो मेरे स्वामी इस से दूर रहें। कहीं ऐसा न हो कि इसका प्रभु-ईश्वर इसकी रक्षा करे और समस्त पृथ्वी की दृष्टि में हमारा अपमान हो।" 22अहीओर का कहना समाप्त होने पर तम्बू के आसपास खड़े सब लोगों ने इस पर आपत्ति उठायी। होलोफ़ेरनिस के उच्च पदाधिकारी, समुद्रतट के निवासी और मोआबी उसका वध करना चाहते थे। 23उन्होंने कहा, "हम इन इस्राएलियो से नहीं डरेंगे। इस जाति में न तो घमासान युद्ध करने का साहस है और न बल। 24इसीलिए, स्वामी होलोफ़ेरनिस! हम आगे बढ़ें और आपकी सेना इसका भक्षण करेगी।"