1महानगर नीनवे में अस्सूरियों पर शासन करने वाला राजा नबूकदनेज़र के बाहरवें वर्ष की बात हैं। उस समय एकबतना में मेदियों पर अरफ़क्षद राज्य करता था। 2इस अरफ़क्षद ने एकबतना के चारों ओर तीन-तीन हाथ चैड़े और छः-छः हाथ लम्बे गढ़े पत्थरों से एक दीवार बनवायी थी। उसने वह दीवार सत्तर हाथ ऊँची और पचास हाथ चैड़ी बनवायी थी। 3उसने फाटकों के ऊपर सौ-सौ हाथ ऊँची मीनारें बनवायी थी, जिसकी नींव साठ हाथ चैड़ी थी। 4उसने फाटकों को सत्तर हाथ ऊँचा और चालीस हाथ चैड़ा बनवाया था, जिससे उसके रथ और पैदल सैनिक पंक्तिबद्ध हो कर बाहर जा सकें।) 5उस समय राजा नबूकदनेज़र ने उस विशाल मैदान में, जो रागौ के प्रान्त में है, राजा अरफ़क्षद के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। 6पहाड़ी प्रदेश के सब निवासियों ने, फ़रात, दज़ला और हिदास्पिस के तटों पर तथा एलामियों के राजा अर्योक के अधीनस्थ मैदानों के निवासी, सभी लोगों ने उसका पक्ष लिया। खलेऊद के लोगों के विरुद्ध लड़ने के लिए अनेक राष्ट्र एकत्र हुए। 7तब अस्सूरियों के राजा नबूकदनेज़र ने फ़ारस के सभी निवासियों और पश्चिम दिशा में रहने वाले सब लोगों, किलीकिया, दमिश्क, लेबानोन, लेबानोन के सामने के भाग के निवासियों और समुद्रतट पर रहने वाले सब लोगों को, 8करमेल और गिलआद में रहने वाले और ऊपरी गलीलिया के विशाल मैदान एस्द्रालोन में रहने वाले लोगों को 9तथा समारिया और उसके नगरों में रहने वाले सब लोगों और यर्दन के उसपार येरूसालेम, बताने, खलूस, कादेश, मिस्र के नाले पर तफ़ने, रामसेस और गोशेन के समस्त प्रान्त में, 10तानिस और मेमफ़िस के आगे ऊपरी प्रान्तों तक तथा मिस्र के और इथोपिया देश की सीमा तक के सब लोगों को सन्देश भेजा। 11परन्तु उन सभी देशों के लोगों ने अस्सूरियों के राजा नबूकदनेज़र के सन्देश पर ध्यान नहीं दिया और युद्ध में उसका साथ नहीं दिया। वे उस से नहीं डरते थे, क्योंकि वे उसे अपना अकेला शत्रु समझते थे। उन्होंने उसके दूतों को अपमानित किया और ख़ाली हाथ लौटा दिया। 12इस पर नबूकदनेज़र उन सभी देशों पर क्रुद्ध हो उठा। उसने अपने सिंहासन और अपने राज्य की शपथ खायी कि वह उन सभी देशों से, किलीकिया, दमिश्क और सीरिया से बदला लेगा और सब मोआबियों, अम्मोनियों, सारे यहूदिया और दोनों समुद्रों के तटों तक के सभी मिस्रवासियों को तलवार के घाट उतारेगा। 13उसने सत्रहवें वर्ष अपनी सेना ले कर राजा अरफ़क्षद पर आक्रमण किया। उसने विजयी हो कर अरफ़क्षद की सारी पैदल सेना, उसकी सारी अश्वसेना और उसके रथों को पराजित किया और उसके सब नगरों पर अधिकार कर लिया। 14उसने एकबतना पहुँच कर उसके बुर्जों को जीता, उसके बाज़ार लूटे और उसकी शोभा मिट्टी में मिला दी। 15फिर उसने रागौ के पर्वतों में अरफ़क्षद को पकड़ा और उसे अपनी साँगों से छेद कर उसका सदा के लिए सर्वनाश कर दिया। 16इसके बाद वह और उसकी विशाल सेना लूट का माल साथ ले कर नीनवे लौट आयी। वहाँ उसने और उसकी सेना ने विश्राम किया और एक सौ बीस दिन तक दावत उड़ाता रहा।