टोबीत

अध्याय 2

1एसरहद्दोन के राज्यकाल में मैं फिर अपने घर वापस आया और मुझे फिर अपनी पत्नी अन्ना और अपना पुत्र टोबीयाह मिले। जब पेन्तोकोस्त, अर्थात् सप्ताहों के पर्व के दिन मेरे लिए उत्तम भोजन तैयार किया गया, तो मैं खाने बैठा। 2मैंने बहुत-से खाद्य-पदार्थ देख कर अपने पुत्र से कहा, "जाओ और नीनवे में निर्वासित अपने प्रभु-भक्त भाइयों में जो मिलें, उन्हें ले आओ, जिससे वे मेरे साथ भोजन करें। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।" 3वह गया और लौट कर बोला कि एक इस्राएली की गला घोंट कर हत्या कर दी गयी है और वह बाज़ार में पड़ा हुआ है। 4मैं तुरन्त उठ कर खड़ा हुआ और अपना भोजन छोड़ कर शव के पास पहुँचा। मैंने उसे उठा लिया और सूर्यास्त के बाद दफ़नाने के लिए छिपे-छिपे अपने घर ले गया। 5शव को छिपाने के बाद मैंने उदास हो कर भोजन किया। 6मुझे नबी अमोस की यह वाणी याद आयी, जो उन्होंने बेतेल में कही थी, "तुम्हारे पर्व के दिन दुःख में और तुम्हारे गीत विलाप में परिणत हो जायेंगे" 7और मैं रोने लगा। सूर्यास्त के बाद मैं उस शव को दफ़नाने गया। 8मेरे सभी पड़ोसी यह कहते हुए मेरा उपहास करते थे, "यह व्यक्ति अब भी नहीं डरता। इस काम के लिए इसे मरवा डालने के लिए ढूँढा गया है और इसे भागना पड़ा। देखो, यह फिर मुरदों को दफ़नाता है।" 9उस रात मैं उसे दफ़नाने के बाद लौट कर नहाया और आँगन की दीवार के पास लेट कर सो गया। गरमी के कारण मेरा चेहरा ढका नहीं था। 10मुझे मालूम नहीं था कि दीवार पर गौरैयाँ रहती थीं। उनकी गरम बीट मेरी आँखों पर ंिगर पड़ी, जिससे मेरी आँखों में मोतियाबिन्द हो गया। मैं इलाज के लिए वैद्यों के पास गया, किन्तु उन्होंने मेरी आँखों पर जितना अधिक मरहम लगाया, मैं उतना ही कम देखने लगा और अन्त में मैं अन्धा हो गया। मैं चार वर्ष तक अन्धा रहा और सभी भाई मेरे कारण दुखी थे। जब तक अहीकार एलिमई नहीं गया, तब तक वह मेरी जीविका का प्रबन्ध करता रहा। 11उस समय मेरी पत्नी अन्ना सिलाई-बुनाई का काम करती थी। 12मालिक उसे पूरी मज़दूरी देते थे। ग्यारहवें महीने के सातवें दिन वह सिलाई का काम पूरा कर उसे मालिकों को देने गयी और उन्होंने मज़दूरी के सिवा बकरी का बच्चा दिया। 13जब बच्चा घर आया और मिमियाने लगा, तो मैंने पत्नी से पूछा, "यह बच्चा कहाँ से आया? कहीं चोरी का तो नहीं है? इसे इसके मालिक को लौटा दो। हम चोरी की चीज़ नहीं खा सकते।" 14उसने उत्तर दिया, "यह मुझे मज़दूरी के साथ बख़शीश में मिला है"। परन्तु मैंने उसका विश्वास नहीं किया और उसे उसके मालिक को लौटा देने को कहा। मुझे उसके इस काम से लज्जा हुई। किन्तु उसने मुझे यह उत्तर दिया, "कहाँ हैं तुम्हारे भिक्षादान? कहाँ है तुम्हारा धर्माचरण? अब पता चला कि तुम कितने पानी में हो!"