आगमन का तीसरा रविवार- चक्र स
सफनिया ३ः१४-१८
फिल ४ः४-७
लुक ३ः१०-१८
ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों, जब सारी मानवता पाप, दुःख व कष्टों में कराह उठी थी तब प्रभु येसु, ‘अनादि शब्द’ व ‘पिता के एकलौते पुत्र,‘ ने इस धरा पर इन्सान बनकर, एक गरीब गौषाला में कुँवारी मरियम से जन्म लिया। रोमियों को लिखे अपने पत्र अध्याय 3ः23-24 में प्रभु का वचन हमसे कहता हैं - ‘‘क्योंकि सबों ने पाप किया और सब ईष्वर की महिमा से वंचित किये गये।’’ पिता ईष्वर ने इंसान को अपने ही प्रतिरूप बनाया; उसे ईष्वर की महिमा का भागीदार बनाया; परन्तु मानव ने पाप करके स्वयं को ईष्वर की महिमा से वंचित कर दिया। मानव ने अपने ही कुकर्मों के कारण स्वयं में ईष्वर की उस सुन्दर छवी को, ईष्वर के स्वरूप को कुरूप कर दिया। लेकिन हमारा प्रभु ‘‘करूणामय तथा कृपालु ईष्वर है,‘‘ (एजे 34ः6-6) वह ‘‘दया और अनुकम्पा से परिपूर्ण है; वह सहनषील और अत्यंत प्रेममय है’’ (सतोत्र 103ः8)। वह हमारा विनाष नहीं चाहता। वह हमें हमारी खोई हुई महिमा लौटाना चाहता है। वह हमें पुनः अपनाना चाहता है। वह हमसे कहता है - ‘‘मैं उनके अपराध क्षमा कर दूँगा, मैं उनके पापों को याद नहीं रखूँगा’’ (यिर 31ः34), ‘‘मैं उनके सभी अपराध धो डालूँगा...और मैं उनके वे सभी कुकर्म क्षमा कर दूँगा (यिर 33ः8)।
अपने इसी वादे को पूरा करने के लिए परमपिता ईष्वर ने अपने एकलौते बेटे प्रभु येसु ख्रीस्त को इस संसार में भेजा। प्रभु येसु ‘अदृष्य ईष्वर के प्रतिरूप’ (कलो 1ः15) हंै। प्रभु येसु में परमपिता ईष्वर ने अपनी करूणा, दया, अनुकम्पा व प्रेम का वो चेहरा प्रदर्षित किया है। प्रभु येसु के द्वारा पिता ईष्वर ने अपनी करूणा को, अपनी दया को सारी मानवता पर उंडेल दिया है। प्रभु येसु ईष्वर की दया का बहता हुआ झरना है और हम सब उस करूणा के झरने से पीकर तृप्त हो जाने के लिए बुलाये गये हैं। पिछले रविवार को संत पिता फ्राँसिस ने रोम में संत पेत्रुस गिरजाघर का पवित्र द्वार खोलते हुवे दया के वर्ष की शुरूआत की है। और इस प्रकार से उन्होंने हमें प्रभु की दया को और अधिक गहराई से समझने व उसका अनुभव करने के लिए बुलाया।
दया के इस वर्ष का आदर्ष वाक्य है, ‘‘अपने स्वर्गीय पिता जैसे दयालु बनों’’ तो यह वर्ष केवल ईष्वर की दया पाने का वर्ष ही नहीं है, परन्तु जैसे प्रभु ने हम पर दया की वैसे दूसरों के प्रति दयावान बनने का समय है। एफे 2ः4 में प्रभु का वचन हमसे कहता है- ‘‘एक दूसरे के प्रति दयालु तथा सहृदय बनें।’’ प्रभु येसु के प्रथम आगमन के लिए लोगों को तैयार करते समय लोगों ने योहन बपतिस्ता से पुछा कि उन्हें क्या करना चाहिए तो वे भी उन्हें दयालु बनने को कहते हैं। वे उनसे कहते हैं - ‘‘जिनके पास दो कुरते हों, वह एक उसे दे दे, जिसके पास नहीं है और जिसके पास भोजन है वह भी ऐसा ही करे।’’ वे नाकेदारों से कहते हैं ‘‘जितना तुम्हारे लिये नियत है उससे अधिक न लो’’ याने बेईमानी से लोगों को मत ठगो; व सैनिकों से कहते हैं -‘‘किसी पर अत्याचार मत करो व झूठा दोष मत लगाओ।’’ हम भी जब उसी प्रभु के हमारी जिंदगी में आने की राह देख रहे हैं तो प्रभु का वचन हमसे भी यही कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा अपने पास मत रखो, उसे गरीबों को दे दो। वचन तो कहता है कि यदि तुम्हारे पास दो कुरते हों तो एक उसको दे दो जिसके पास कुुछ भी नहीं है। एक दे देने के बाद भी तुम्हारे पास कम से कम एक और है परन्तु उस गरीब भीखारी, गरीब बच्चे के पास तो कुछ भी नहीं है, वो नंगा घूम रहा है, वो फटेहाल है। हम सब ने रेलवे स्टेषन व गलियों में अर्धनग्न अवस्था में घुमते इंसानों को देखा है। और हमने उनको कुछ देने की जगह उन्हें भला-बूरा भी कहा है। जब हमारे पास किसी गरीब ने आकर हाथ फैलाया तो हमने उससे अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेरीं है। जहाँ नाम, सम्मान और पहचान मिलती है वहाँ हम दान-पुण्य तो करते ही हैं परन्तु प्रभु आज हमसे कहते हैं कि रात के अंधेरे में जाकर फूटपाथ पर पडे ठिठूरते हुवे किसी अभागे को एक कंबल ओढा दो।, रोटी के एक निवाले के लिए तरसते किसी गरीब को कुछ खाने को दे दो, वहाँ आपकी तारिफ करने वाला शायद कोई नहीं होगा परन्तु ‘‘तुम्हारा पिता जो सब कुछ देखता हे तुम्हें पुरस्कार देगा’’ (मत्ती 6ः4), वह हमसे कहेगा - ‘‘जब मैं भूखा था तब तुमने मुझे खिलाया; प्यासा था तब क्या तुमने मुझे खिलाया; नंगा था तब तुमने मुझे पहनाया; और जब मैं बंदी, बिमार व परदेषी था तो तुम मुझसे मिलने आये‘‘ (मत्ती 25ः35-36)।
मुक्ति प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग प्रेममय सेवा ही है। पवित्र काथलिक कलीसिया की धर्मषिक्षा में हम दया के कार्यों के बारे में सिखते हैं। ये दया के कार्य, प्रेममय सेवा के कार्य हैं जिनके द्वारा हम हमारे पडोसियों की शारीरिक व आध्यात्मिक ज़रूरतों में मदद करते हैं। भ्रमितों का मार्गदर्शन करना, अज्ञानियों को षिक्षा देना, पापियों को सचेत करना, पीडितों को सांत्वना देना, अपराधियों को क्षमा करना, धैर्य के साथ अन्याय को सहन करना व मृतकों व जीवितों के लिए प्रार्थना करना ये सब दया के आध्यात्मिक कार्य हैं। तथा भूखों को खिलाना, प्यासों को पिलाना, वस्त्रहीन को पहनाना, बेघरों को आश्रय देना, बिमारों की सेवा करना, उनसे मिलने जाना, कैदियों से मिलने जाना, व मुर्दाें को दफनाना ये सब दया के शारीरिक कार्य हैं। इन सब में गरीबों को दान देना किसी के प्रति दया दिखाने का सबसे उत्तम कार्य है; यह न केवल सेवा का परन्तु न्याय का कार्य भी है। (ब्ण् िब्ब्ब् 2447)
मदर तेरेसा कहती हैं कि एक बार वो ऐसे हिंदू परिवार से मिली जिसने कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया था। मदर ने उन्हें थोडा चावल दिया। उस परिवार की माँ ने जो किया उसे देखकर मदर स्तब्ध रह गयी। उसने उस चावल को दो हिस्सों में बाँट दिया व उसका आधा हिस्सा लेकर वह अपने मुसलिम पडोसी के घर गई और उन्हें दे दिया। यह देखकर मदर ने उससे पुछा यह क्या किया तुमने अब तुम्हारे परिवार के लिए कितना बचा है? क्या इतना आप लोगों के लिए पर्याप्त होगा?’’ इस पर उस औरत ने जवाब दिया - ‘‘लेकिन उन लोगों ने भी तो कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया है।’’ इसे कहते हैं ेींतपदहए इसे कहते हैं मिल-बाँट कर खाना। हमें सारे संसार की समस्याओं को समाप्त करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए हम व्यक्तिगत रूप से पूरी दुनिया की गरीब तो मिटा नहीं पायेंगे। एक बार किसी ने मदर तेरेेसा से व्यंग्यात्मक रूप से पुछा कि संसार में इतने सारे भूखे लोग हैं उन सबको वह कैसे खिलाइगी। इस पर मदर ने शाँतभाव से कहा -‘‘एक-एक करके’’। जि हाँ हम कमसे कम जब भी हमें किसी एक भी गरीब की मदद करने का अवसर मिलता है तो हमें ज़रूर उसकी मदद करना चाहिए। मदर तेरेसा ने प्रभु की दया व करूणा को वस्त्र की तरह धारण कर लिया था। वह इस दुनिया में प्रभु की दया का एक जीवन्त उदाहरण थी, तथा हम सब ख्रीस्तीयों के लिए एक आदर्ष भी। हम जहाँ गरीब, गंदे व मटमेले बच्चों से कतरा कर निकल जाते हैं वहीं मदर ने ऐसे बच्चों को उठाकर गले से लगा लिया व उन्हें पे्रम से चूम लिया; किसी का सडा हुआ घाव देखकर हम आँखें फेर लेते हैं, व बदबू से नाँक बंद कर लेते हैं, पर वहीं मदर ने अपने हाथों से ऐसे घावों को धोया व उनकी मरहम पट्टी की।
प्यारे भाईयों और बहनों, जब हम यह दया का वर्ष मनाते हैं व आज का सुसमाचार भी दया के कार्य करने को हमें सिखलाता तो आईये इस बार हम ‘दया का क्रिसमस मनायें।’ हर ख््राीस्त जंयति हम हमारी ही खुषी के लिए मनाते हैं, आईये इस बार हम इस दूसरों की खुषी के लिए ख्रीस्तजंयति मनायें। हर क्रिसमस पर हम हमारे लिए नये ब्रांडेड कपडे ज़रूर खरीदते हैं तो इसके साथ ही, आईये हम किसी गरीब नंगे तन को भी ढँक दें; हर क्रिसमस पर हमारे घरों में तरह-तरह के पकवान जरूर बनते हैं व सपरिपवार हम इसका लुफ्त उठाते हैं तो आईये इस बार हम हमारे पकवान गरीबों के भी साथ बाँटे। ख्रीस्त जंयति की खुषी को हम अपने ही घर की दिवारों तक सीमित न रखें। किसी मुरझााये, दुखित चेहरे को मुस्कुराहट प्रदान करें; किसी बुझते चिराग को प्रभु की ज्योति से पुनः आलोकित करें। इससे हमें जो आनन्द व आध्यात्मिक लाभ होगा शायद वह क्रिसमस को अपने घरों की चार दिवारों में मनाने से नहीं मिलेगा।