इसायाह 60:1-6
एफे 3:2-3,5-6
मत्ती 2:1-12
आज हम पवित्र परिवार का पर्व मना रहे है. एक परिवार में जन्म लेकर प्रभु येसु ने परिवारों को पवित्र कर दिया है। नाज़रेथ का पवित्र परिवार सभी ख्रीस्तीय परिवारों के लिए आदर्श है। येसु, मारिया और जोसफ तीनो मिलकर परिवार में हर एक सदस्य की सच्ची भूमिका का आदर्श हमारे सामने रखते हैं। आइये आज हम नाज़रेथ के परिवार को अपने परिवारों की आधारशीला मानते हुए आज के परिवेश में ख्रीस्तीय परिवारों पर मनन चिंतन करें।
ख्रीस्तीय परिवारों में माता-पिताओं का दायित्व
जिस प्रकार से समर्पित धर्मसंघी जीवन एक धार्मिक बुलाहट है, ठीक उसी प्रकार वैवाहिक जीवन भी एक पवित्र बुलाहट है। जब ईश्वर आदम हेवा का जोडा बनाया तो उन्न्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- फलो फूलो और संसार में फैल जाओ। आज माता-पिता इसी पावन कार्य को निभा रहे हैं। अतः माता-पिता का दायित्व कितना महान है। वे आज ईश्वर की सृष्टि के उसी कार्य को जारी रख रहे हैं। वे भावी कलीसियाा और राष्ट्र के निर्माता हैं। भावी कलीसिया और राष्ट्र उनके हाथ में हैं। वे बच्चों के प्रथम शिक्षक - शिक्षिकाएं हैं । उन्हें वे जैसे संस्कारों से विभूषित करेंगे, भावी कलीसिया भी वैसी ही होगी। बच्चों का मन एक कोरा कागज है। वे उसमें जैसा लिखेंगे, वह सदा वैसी ही रह जायेगा। वे कुम्हार की तरह है, तो बच्चे गीली मिट्टी की तरह। बच्चों का भावी स्वरूप माता-पिता के हाथों में है। वे कुशल माली तरह हैं। माली यदि निष्ठापुर्वक फूलवारी की देखभाल करता है, तो फूलवारी की सुन्दरता में चार चाॅंद लगना ही है। उसी प्रकार यदि माता-पिता अपने बाल-बच्चों तथा परिवार के प्रति निष्ठावान होंगे, तो परिवार को आदर्श परिवार बनने तथा होनहार सन्तानों के पैदा होने से काई नहीं रोक सकता। अतः माता-पिता को निम्नलिखित बिंदुओं पर विषेष ध्यान देना है-
1. माता-पिता का जीवन-आदर्श
कहा जाता है कि उदाहरण भाषण से बेहतर होता है। अर्थात् कथनी से करनी बेहतर है। कहने का अर्थ है- बच्चों को उपदेष देने या समझाने से उत्तम है खुद कर के दिखाना, क्योंकि बच्चे नकलबाज हैं। वे उपदेष या भाषणा पर उतना ध्यान नहीं देंगे जितना माता-पिता की कार्यशैली पर ध्यान देंगे। वे माता-पिता की हरर गतिविधी की नकल करेंगे। जैसे मता-पिता पियक्कड हैं और अपने बच्चों को समझाते हैं कि दारू बिना अच्छा नहीं है, तो क्या वे उनकी बातों को मानेंगे। कभी नहीं। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को समझाने से पहले अपने को आदर्श पेश करें। बच्चे खुद ब खुद मान जायेंगे।
2. अनुशासन
जिस प्रकार घोडे को नियंत्रण में रखने के लिए लगाम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार बच्चों को भटकने से रोकने बचाने के लिए अनुशासन की नितान्त आवश्यकता है । इसिलए धर्मग्रंथ कहता है- जो घोडा पालतु नहीं बनाया गया, वह वश में नहीं रहता। उसी प्रकार यदि पुत्र भी स्वछंद छोडा गया, तो वह उदण्ड बन जायेगा। तुम उसे जवानी में पूरी स्वतंत्रता मत दो और उसके अपराधों को अनदेखा मत करो। वह हठी बनकर तुम्हारी बात नहीं मानेगा और तुमको उसके कारण दुख होगा। तुम अपने पुत्र को शिक्षा दो और अनुशासन में रखो। नहीं तो तुमको उसकी दुष्टता के कारण लज्जा होगी। (प्रवक्ता 30:8 ) आजकल पतिवार में बच्चे काम होने के कारण माता पिता अपने बच्चों को आवश्यकता से अधिक लाड़ प्यार करते व् उनकी हर ख्वाहिश पूरी करते हैं। वे ये भूल जाते हैं कि वे ऐसा करके अपना व अपने बच्चों का भविष्य अंधकार में कर रहे हैं। पवित्र वचन कहता हैं - "जो अपने पुत्र को प्यार करता है, वह उसे कोड़े लगता है, जिससे बाद में उसे अपने पुत्र से सुख मिलेगा। जो अपने पुत्र को अनुशासन में रखता है उसे बाद में संतोष मिलेगा।" (प्रवक्ता 30:१-२) बहुत बार माता-पिता बच्चों की गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं। वे सोचते हैं कि अरे बच्चा छोटा है। जब बडा हो जायेगा तो अपने आप सुधर जायेगा, लेकिन कभी-कभी यह भयंकर रूप ले लेता है। अंग्रेजी में एक कहावत है - ए स्टीच इन टाइम सेवस नाइन। याने यदि हम समय रहते कपडे को सील लें तो एक टांके में ही काम हो जाता है, पर यदि हमने ध्यान नहीं दिया तो भविष्य में हो सकता है नौ टांके लगाने पड़े। इसलिए हम समय रहते अपने बच्चों को सुधारें।
इसके आलावा पवित्र वचन बच्चों से स्पष्ट शब्दों में कहता है - " अपने माता पिता का आदर करो जिससे तुम बहुत दिनों तक जीवित रह सको। " (निर्गमन २०:१२ ) "बच्चो! अपने माता-पिता की आज्ञा मानों, क्योंकि यह उचित है।अपने माता-पिता का आदर करो। यह पहली ऐसी आज्ञा है, जिसके साथ एक प्रतिज्ञा भी जुड़ी हुई है,जो इस प्रकार है- जिससे तुम्हारा कल्याण हो और तुम बहुत दिनों तक पृथ्वी पर जीते रहो।"
एफेसियों 6: 1-3
अतः हर ख्रीस्तीय बच्चे का यह परम कर्त्तव्य है कि वे अपने माता पिता का कहना माने। संत लुकस 2: 51 में वचन कहता है - "येसु उनके साथ नाज़रेथ गए और उनके अधीन रहे। जी हैं ईश्वर होते हुवे भी येसु माँ मरियम और पालक पिता युसूफ के अधीन रहे। इसलिए हमें भी अपने माता पिता की अधीनता स्वीकार करनी चाहिए।
आइये आज हम नाज़रेथ के परिवार के सामान अपने परिवार को ईश्वर